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यदि मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) शरीर अपने तन मन से जीवन से दूसरे मानवों के प्रति ईर्ष्या, राग द्वेष , छल छद्म , झूठ पाखण्ड , धोखा दगा , विश्वासघातीय चतुराई चालाकी व आत्मवत् सत्य व्यवहारीय रूप भूलकर जीने वाले निज सुख स्वार्थ में रत होकर जीने वाली मनोभाविता को त्याग दे तथा छल छद्म , झूठ , पाखण्ड ,धोखा,दगा, पारस्परिक ईर्ष्या , विश्वासघातीय व अन्यायीय अत्याचारीय रूप स्वरूप से मुक्त कर ले एवं “आत्मवत् ” रूप में प्रत्येक मानव (नर नारी ,स्त्री पुरुष ) एक दूसरे को पहिचान ले , तो सत्ता का मद्, पद का अहंकार चाहे वह राजसत्ता तंत्र में विस्थापित हो या अन्य शासकीय विभागों में पद प्रतिष्ठित रहने वाला हो । चाहे शिक्षा तंत्र हो, स्वास्थ्य तंत्र हो , न्याय तंत्र हो या अन्य कोई भी जीवन रक्षण सम्बन्धी विभाग हो । अत:मानव द्वारा अपने स्वयं के एक दूसरे से सम्बन्धित निजी कार्य व्यापार हो या कार्य व्यवहार वाले काम हों। उन्हे व्यक्तिगत सार्वजनिक सत्य पारदर्शीय स्वरूपीय रूप से हर जगह अपनी पूर्ण परम सत्य ईमानदारीय नियत से जहां जो भी सत्य कर्तव्य दायित्व किसी भी दूसरे मानव के प्रति बनता हो उसे बिना किसी भेद भावीय स्वरूप या अन्य कोई बे-ईमानी , असत्यता के दायरे के घेरे से बाहर निकलकर उसका सत्य निर्वहन करे । तो सारे संघर्ष खतम हो जायेंगे अथवा सारे लड़ाई झगड़े बंद हो जायेंगे । घर परिवार के,  बाह्म जगद् के संसार , समाज के और भारत से लगाकर विश्व के सृष्टिपटल पर विद्यमान मानवों के सारे जितने बनाये गये नियम , अधिनियम नीतियां प्रभावहीन हो जायेंगी । शून्यता को प्राप्त कर लेंगी और सकल सृष्टि का मानवीय समुदाय सुख, शान्ति , आनन्द की चैन की सांस लेगा और पूर्ण चैन सुख से जियेगा और संविधान व अन्य नियम अधिनियम की कहीं कोई महत्ता  ना ही होगी / ना ही रहेगी और इनका पारस्परिक मानव समुदाय द्वारा ना ही विरोध होगा और ना ही विरोध रहेगा। पारस्परिक संघर्ष की स्थितियां हर जगह घर परिवार , संसार समाज से अंतोगत्वा प्रत्येक सृष्टिमानव को अपने अपने राष्ट्र के नियम नीतिगत कानून संवैधानिक अधिनियम इनकी तथा इनके कारण पारस्परिक संघर्ष करने की कोई आवश्यकता न होगी और न रहेगी । मेरे आत्मवत् बन्धुओं , माताओं , बहिनों , बेटियों , युवाओं मेरे सत्य को समझो , पहिचानो और स्वयं की नियत को बदल डालो और स्वयं की नियत (मंशा) की खोट को बदल डालो । व्यक्ति का ( नर नारी, स्त्री पुरुष ) दोष नहीं है बस स्वयं की नियत की खोट की ही गलती ,भूल का दोष है । इस सत्य को सत्य से समझ जाओ । अर्थात् संसार जैसा चल रहा है और चला आ रहा है इसमें जो भी लड़ाई ,झगड़े व पारस्परिक अन्तर्द्वन्द सबकी मूल जड़ मनुष्य ( नरनारी, स्त्री पुरुष ) के मन मस्तिष्क , दिल की खोटीय , कपटीय , भेदभावीय मनोभाव का सिर्फ दोष है। जो कोई कहता है कि संविधान लागू रहे और कोई कहता है कि यह नियम बदल दिया जाये , यह अधिनियम बनाया जाये और लागू किया जाये और कोई चाहता है कि यह नियम लागू न हो, वह नियम लागू न हो संविधान हटा दिया जाये संविधान मिटा दिया जाये । भारत की असंख्य आबादी में ज्यादातर लोग अथवा कमतर लोग संविधान को ही लागू रखने की चाहना रखते हैं। जिस दिन मनुष्य ( नर नारी, स्त्री पुरुष ) के मन मस्तिष्क की नश्वर संसारीय पंचविकारीय मनोभावीय खोट नियत व्यक्ति के मन से हट जायेगी । उस दिन यह पारस्परिक सारा द्वन्द सृष्टिपटल के भारत से और विश्व के देशों से समाप्त हो जायेगा , हट जायेगा तथा भारत से लगाकर विश्व के सभी देशों में प्रत्येक मानव के मनमस्तिष्क हृदय में सुख शान्ति, चैन आनन्द का पूर्ण परम सत्य रूप में निवास होगा।

” कोई न होगा भूखा प्यासा , सबकी होगी पूरन आशा । मानव मन की नियत खोट का हो जायेगा अच्छा खासा खात्मा , मानव तन मन हृदय से हट जायेगी सम्पूर्ण निराशा । भारत से लगाकर विश्व में हर दिल में हर मन में खुशी का डंका बजेगा अच्छा खासा । “

ना करो किसी का शोषण , ना करो किसी पर अत्याचार । यही मानव जीवन का सार , इसी से होता मानव उद्धार ।

सम्बन्धित प्रेरणादायी शब्द सार –

जिंदगी इक किराये का घर है,इक न इक दिन बदलना पड़ेगा ।
मौत जब तुझको आवाज देगी,घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥

रूठ जायेंगी जब तुझसे खुशियां
गम के सांचे में ढलना पड़ेगा
वक्त ऐसा भी आयेगा नादां
तुझको कांटों पे चलना पड़ेगा

इतना माजूर हो जाएगा तू,
इतना मजबूर हो जाएगा तू,
ये जो मखमल का चोला है तेरा ,
ये कफन मेँ बदलना पड़ेगा

कर ले ईमां से दिल की सफाई,
छोड़ दे छोड़ दे बुराई,
वक्त बाकी है आप ही संभल जा,
वरना दो ज़ख मेँ जलना पड़ेगा ॥

ऐसी हो जाएगी तेरी हालत,
काम आएगी दौलत न ताकत,
छोड़कर अपनी उँची हवेली,
तुझको बाहर निकलना पड़ेगा॥

जलवा ए हुस्न भी जां बजां है,
और खतरा भी है ज्यादा,
जिंदगानी का ये रास्ता है ,
हर कदम पर सम्हलना पड़ेगा ।

बाप बेटे ये भाई भतीजे
तेरे साथी है जीते जीते,
अपने आँगन से उठना पड़ेगा,
अपनी चौखट से टलना पड़ेगा॥

है  बहुत ही बुरी चीज दुनिया ,

क्यों समझता है दुनिया को अपना

बाज आजा गुनाहों से वरना

उम्रभर हाथ मलना पड़ेगा ।

प्यार से सबको अपना बना ले ,
जिस कदर हो सके तू दुआ ले ,
मत लगा आग नफरत की नादां,
वरना तुझको भी जलना पड़ेगा ।

बाल से भी बारीक है बारीक  रस्ता ,
और तलवार से तेज तल है ,
उसपे गठरी गुनाहों की लेकर,
हस्र में तुझको चलना पड़ेगा ।

गम के मारों की हालत पर नादां ,
हंस रहा है मगर याद रख ले ,
अश्क बन बन के आंखों से अपनी ,
एक दिन तुझको ढलना पड़ेगा ।

कब्र में जिस घड़ी जायेगा तू ,
नेकियां काम आयेंगीं तेरे ,
बाज आजा गुनाहों से वरना ,
हश्र तक हाथ मलना पड़ेगा ।

चाहता है अगर सुर्ख रुई,
चाहता है अगर नेक नामी ,
तो ये अदा छोड़नी होगी तुझको ,
इस चलन को बदलना पड़ेगा ।

है अगर तुझको इंसान बनना ,
तो ये कैशल मेरी बात सुन ले
छोड़नी होगी हर इक बुराई ,
ख्वाइशों को कुचलना पड़ेगा ।

जिंदगी एक किराये का घर है,
एक न एक दिन बदलना पड़ेगा…

मौत जब तुझको आवाज देगी,
घर से बाहर निकलना पड़ेगा ॥

( साभार रचयिता )

अगर मनुष्य( नर-नारी , स्त्री-पुरुष की) की मन मस्तिष्कीय खोटी नियत , कुटिल कपटीय , छल छद्मीय , झूठी पाखण्डीय , नियत बदल जाये । तो मेरा पूर्ण दृढ़ अडिग विश्वासीय दावा है कि इस समग्र सृष्टि पटल पर ही स्वर्ग व जन्नत जिसे मैने देखा नहीं क्योंकि मैं अभी मरा नहीं। वह है या नहीं मैं कह नहीं सकता । यदि अगर वह है कहीं । तो वह इस समग्र सष्टि पटल के धरती पर / इसी पृथ्वी पर ही दिखाई देगा अथवा बन जायेगा । वैसे मैं अंधविश्वास करने से दूर होने का पूर्ण परम सत्य प्रयत्न करने में रत हूँ, तत्पर हूँ और इसी खोज में हूँ कि संसार और इस जनम और जीवन का सत्यतात्पर्य क्या है , इस जनम लेने का और जीवन जीने का सत्य औचित्य क्या है? मेरे समक्ष यह जटिल प्रश्न खड़ा हुआ है। । वैसे मैं स्वर्ग की कामना भी नहीं करता बस अच्छे कर्म करता हुआ किसी के दुःख का कारण न बनता हुआ मरि जाऊं । बस इतनी कामना है।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री ”

 

 

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