कर्ज की छांव में खड़ा सपना”

गांव के एक छोटे से घर में तीन भाइयों का परिवार था। खेती ही उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया थी, लेकिन बीते कुछ सालों से मौसम की मार और बाजार की मार से खेती पर संकट के बादल छाए थे। कर्ज बढ़ता जा रहा था। इस परिवार में बीच वाला भाई – “शिव” – जो पढ़ा-लिखा था, मगर खेती की मजबूरियों में फंसा हुआ था, अपने परिवार की रीढ़ बना हुआ था।

जब बड़े भाई की बेटी “रोशनी” दसवीं कक्षा में अच्छे अंकों से पास हुई, तो शिव को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। उसने तय किया कि चाहे जैसे भी हो, रोशनी की पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए। उसने गांव से दूर शहर में एक पुराना कमरा किराए पर लिया, रोशनी को वहां रखा और उसकी पढ़ाई का जिम्मा उठाया। खुद उसने 700 किलोमीटर दूर, भुवनेश्वर के पास एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी पकड़ ली – मन नहीं था, मगर हालात से बड़ा कुछ नहीं होता।

वहां उसने बहुत कठिन दिन देखे। शुरुआत के कई दिन स्टेशन के बेंच पर गुजारे, कभी ऑफिस के गार्ड से कहकर रात मे आफिस मे ओवर टाईम काटी। जब पहली तनख्वाह दो माह बाद मिली, तब जाकर उसने एक सस्ते हॉस्टल में बिस्तर किराए पर लिया। खाने-पीने की तंगी, सफर की थकान, और घर की याद – सब झेलते हुए वह रोशनी की फीस जमा करता रहा।

उसकी तबीयत भी बिगड़ने लगी। लीवर की समस्या, अनिद्रा, गैस की तकलीफ… फिर भी हार नहीं मानी। पत्नी और अपनी छोटी बच्ची को बुलाकर भुवनेश्वर में ही रखा, खर्च और बढ़ गया, मगर उसने सब झेल लिया।

रोशनी ने मेहनत की। UPTU के ज़रिए उसे एक अच्छा कॉलेज मिला। मगर हॉस्टल, फीस, किताबें – सबकुछ पैसों से जुड़ा था। शिव ने गिरवी रख दिये सोने के गहने तक रख दिए, ब्याज बढ़ता गया, लेकिन सपना नहीं टूटा।

जैसे-तैसे रोशनी की इंजीनियरिंग पूरी हुई।
मगर तब तक शिव की सेहत जवाब दे चुकी थी। उसे नौकरी छोड़नी पड़ी और वह वापस गांव आ गया। अब उसे उम्मीद थी कि खेती से थोड़ा कर्ज चुकाया जाएगा, लेकिन मटर की कीमतें गिर गईं, फसल का दाम नहीं मिला। ब्याज बढ़ता रहा।

बहन और बहनोई ने कुछ मदद की। बैंक का ग्रीन कार्ड लोन चुकाया, ट्रैक्टर के लिए थोड़ा पैसा दिया, मगर कर्ज की जड़ें गहरी थीं। छोटे भाई ने भैंस पालन का सपना दिखाया, बहन से पैसा लेकर महंगी भैंसे खरीदी गईं, मगर आमदनी नहीं हुई। उल्टा सोलह लाख का नया कर्ज चढ़ गया।

वही शिव की बेटी अब इंटर कर चुकी थी, इंजीनियरिंग की तैयारी कर रही थी, लेकिन प्रयास में सफल नहीं हो पाई। अब वो CUET के ज़रिए एक अच्छे कॉलेज में जाने की कोशिश कर रही है, ताकि सरकारी स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन के ज़रिए अपनी पढ़ाई पूरी कर सके।

शिव की तबीयत आज भी ठीक नहीं। सीने मे र्दद, पेट की परेशानी, नींद न आना, तनाव और खेती के बंटवारे का डर – ये सब उसे अंदर से तोड़ते जा रहे हैं। उसके पास अब ना नौकरी है, ना ठिकाना। केवल एक चीज़ है – हौसला। वही हौसला जिससे उसने अपने भाइयों के बच्ची को पढ़ाया, बहन की शादी कराई, और अब अपने बच्चों के लिए भी सपने बुन रहा है।

यह कहानी एक व्यक्ति की नहीं, उस पूरे समाज की है जहाँ जिम्मेदारियां तो बहुत होती हैं, मगर संसाधन सीमित होते हैं।

यह कहानी बताती है कि असली नायक वही होता है जो खुद टूट कर भी औरों को आगे बढ़ाता है।

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