यह वर्णीय ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र जातिगत वर्गीकरण राष्ट्र में नित्य प्रतिरोज तमान विसंगतियां व्यक्ति में पारस्परिक राग द्वेष विद्रोह विषमताएं उत्पन्न कारक है। व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक ,आर्थिक ,शैक्षिक , दैहिक शोषण का पूर्ण प्रतीक है ही और ऊंच नीच का व्यक्ति में मानसिक रूप से ऊंचे वर्णों में अहंकार की प्रेरणा देने वाला व नीचे वर्ण में आत्म साहसीय, हीनता , भय, डर, निर्बलता, दुर्बलता, कायरता, असुरक्षीय भावनायें व्यक्ति में उत्पन्न करने वाला तथा दमित भाव व्यक्तिके मनोदशा मनोविचारों में उत्पन्न करने का रूप है । व्यक्ति में हीन भावनाओं को जन्म देने वाला ऊंचे वर्ण द्वारा निम्न वर्ण की घोषितता हर स्तर से व्यक्ति में मनोबल का हरण-क्षरण करने वाला है। निम्न वर्णीय व्यक्ति जीवन के हर कार्य व्यापार में आत्म साहस की कमी कमजोरियों के कारण जीवन के हर स्तरीय कार्य चाहे वह कमाना हो , चाहे वह खाना पीना हो या सोना जागना हो या कोई भी जीवन के सुख भोग हों आत्मसाहस, आत्म स्वाभिमान की कमी कमजोरियों के कारण असहाय सा घुटने टेकने वाला । तथा उच्च वर्ण द्वारा हर स्तर से दमित किये जाने कारण निम्न वर्ण देकर हर स्तर से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, शैक्षिक, दैहिक, अपने तन मन में व्याप्त अहंकारीय प्रेरणा से निम्न वर्ण की मारपीट, लूट खसोट, श्रम – मेहनत, मूल्य का हरण, हत्या, मर्डर ,बलात्कार और निम्न वर्ण रूपी जातिगत शब्द कुशब्द , गालियां यह सब नित्य की कार्यधारा उच्च वर्ण स्वरूप व्यक्ति की सदैव जातिगत अभिमान कारण नित्य प्रति देश में राज्य में नगर में गली मोहल्लों में आदिकाल से आजतक दृष्टिगोचर होती हैं अथवा दिखाई व सुनाई देती हैं। निम्नवर्ण की इज्जत , मर्यादा व स्वाभिमान को हर पल ,हर क्षण,हरण करते हुए तार-तार किया जाता है व तार-तार होती दिखाई देती है। देश में सरकारी आंकड़े जिन्हें सरकार शासन व्यवस्था के द्वारा हजारों में घटने वाली घटनाओं को सैकड़ों में पारस्परिक विद्रोहात्मक स्थितियां उत्पन्न न हों बताई जाती हैं और ऐसे ही जातिगत व्यवस्था ऐसे ही लुटते पिटते, शोषणकारी नीतियों के चलते फलते फूलते चलती रहें। कोर्ट अदालतों में लाखों मुकदमें वर्षों से चलते रहने के ज्यादातर सवर्ण और शूद्रों के प्रतीक व उपरोक्त सत्यता के द्योतक हैं। सत्य न्याय भी ज्यादातर रूप,रंग, वर्ण, ताकत की शक्ति देखकर न्यायधीशों द्वारा रुपया पैसे का लोभ लालच दबंगों आतंकवादियों आतंकियों, धन्ना सेठों व शासकीय,राष्ट्रीय,धूर्त ,अन्यायियों, अत्याचारियों, राजशक्ति, राष्ट्र नेतृत्व शक्ति सत्ताधीशों के कारण सबल, सशक्त, अनाचारी, दुराचारी, अनैतकीय मानसिकधारी नेताओं के कारण सदैव प्रभावित होती व रहती है। इसमें भी ज्यादातर न्यायधीशों का चरित्र संदिग्ध , लोभ लालच , पद प्रतिष्ठीय रूप रंग की लालसा में न्याय का रूप सत्य का असत्य और असत्य का सत्य रहता है। शैक्षिक संस्थानों में ,न्यायिक संस्थानों में और सार्वजनिक शासकीय सुविधाओं में, कार्यबाजारीय रूप रंग में , आफिसीय कार्य प्रणालियों में उच्च निम्न वर्ण का भेद भावीय स्वरूप परिलक्षित होकर दृष्टिगोचर होकर सदैव हरदम नित्य प्रति निम्न वर्णीय माता-बहिन-बेटियों को, बालक-बालिकाओं को तथा मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, प्रभावित रखते हैं । जातीय व्यवस्था आदिकाल से चली आ रही और आज तक भी वर्तमान में पूर्ण सत्य रूप से व्यक्ति में अहंकार को जन्म देकर मानव द्वारा समान मानव जिसकी शारीरिक मानसिक हर क्रियाओं प्रक्रियाओं में एक जैसी समानता होने , रहने कारण मानव शरीरों को भेदभावीय वर्गीकरण में रखना, बांटना, व तन , मन, जीवन सम्बन्धी हर कार्य रंग रूप में उसका संचालन, चलन चालन पूर्णतया अन्याय परक है, अत्याचारीय परक है । ईश्वरीय परम आत्मीय द्वारा की गयी मानव जीवन की संरचना , रचना के प्रति पूर्ण अन्याय परक है । ईश्वरीय नियम नीति के पूर्णतया विपरीत है। यह यदि उच्च वर्ण व निम्नवर्ण रूप रंगीय स्वरूप से व मानसिक भाव विचारीय धारा से तथा मनोदशा से हट जाये, समाप्त हो जाये ? तो जो नित्यप्रति हर पल हर क्षण मानव द्वारा मानव (नर-नारी , स्त्री-पुरुषों ) से अत्याचार , लूटखसोट, अहंकारीय प्रेरणागत मारपीट हत्या, मर्डर , बलात्कार व आर्थिक , शैक्षिक , श्रमीय, मेहनतीय, पारिश्रमिक शोषण , स्वाभिमानीय हरण दायी शोषण, कोर्टकचेहरियों में, न्यायालयों में आने वाले व जाने वाले मानव द्वारा मानव के प्रति अन्याय अत्याचार परक सारे मामले समाप्त हो जायें और ईश्वरीय स्वरूप प्रकृति माता के बीच- बीच में सृष्टि पटल पर रोग दोष बीमारियां भूकम्प तूफान सुनामी जैसी मानवजीवन निगलने वाली विभिन्न- विभिन्न रूपीय विपदापरक आपदायें जो प्रकृति के कहर रूप में आती हैं, बिजली रूप में बरसती हैं , यह सब अवश्य ही घटना बन्द हो सकती हैं। परमपिता परममाता , जगतपिता जगत माता पूर्ण परमसत्य व पूर्ण दयालु है वह ही इस समग्र सृष्टिपटल पर पूर्ण परम सत्य न्यायदाता है। व्यक्ति ( नर-नारी , स्त्री-पुरुष) ईश्वर के न्याय पर विचार कर सकते हैं। कि वह सदैव निरासक्त , निलिप्त, निर्विकार, निर्मोहीय, निरहंकारीय , निर्लोभीय , निष्कामीय, पूर्ण परम सत्य न्यायदाता है। वह सत्य न्याय करता है। सोचो ? उसकी आंखों में अपना चरित्र आचरण गिरा कर छल, छद्म , झूठ , पाखण्ड , धोखा दगा , अन्याय अत्याचार का प्रयोग करके उसकी आंखों में धूल झोंककर काम करनेवाला आचार सत्य नहीं है । वह जगद दाता प्रदाता है। जगद नियामक संचालक है। वह दूध का दूध , पानी का पानी करने वाला है। हे मानव ! तू सोच सकता है। कि कुम्भ स्नान, गंगा स्नान ,तीर्थ स्थल , मन्दिरों में जाने आने के बाद व आने जाने लौटने के बाद रास्तों में वीभत्स घटनाओं का शिकार होकर सपरिवार मातापिता, पतिपत्नी , बालगोपाल , बच्चे बच्चियां क्यों शिकार होती हैं ? परिवार के परिवार क्यों साफ होते हैं ? और वह भी बड़ी दर्दमयी दर्दनाक हादसों का शिकार होकर । इकट्ठी की गयी अनैतिक तरीकों से सारी धन,सम्पत्ती, कोठी, बंगला, कार, महल सबका सब छोड़कर दर्दनाक मौत मर जाते हैं । विचार करो आंखें खोलो सच्चे सत्य (ईश्वर) के पुजारी बनो । जीवन आनन्द परक , सुखशान्ति परक सपरिवार चलेगा, जिएगा व उस सत्य सत्येश्वर की सत्य न्याय नीति अन्तर्गत सृष्टि धरा से महाप्रयाण करेगा। समझो जागो ईश्वरीय परमसत्ता की न्याय नीति से न कोई बचा है और न कोई बचेगा । जागो, होश में आओ। हे मेरे आत्मिक भाइयों, माताओं , बहिनों ,बेटियों , बालक बालिकाओं । जातिगत अभिमान को त्यागो जातियां खत्म करो। ईश्वरीय संरचना समान मानव को आत्मिक समान स्वरूप को समानता दो । अनैतिकीय पापाचारों को जन्म देने से बचो तथा उन्हे अपने परिवारीय विनाशीय स्वरूप से विनाश मुख में जाने से स्वयं बचो, सबको बचाओ । यही ईश्वरीय सत्यन्यायी रूप रंग का सत्य संदेश है। जागो सत्य प्रकृति सत्य प्रवृत्ति को धारण करो। असत्य अन्याय परक अत्याचारीय व्यवस्था का अन्त करो। यही मानव की पूर्ण व परम सत्य सर्वोपरि सर्वोच्च बुद्धिमत्ता है व होगी व रहेगी। हर कोई जानता है कि परमेश्वर अहंकार को खाता है फिर यह उच्च वर्ण और निम्न वर्ण क्यों व वर्णीय वर्ण गत अहंकार क्यों ? यही पाप का मूल है इसे समाप्त करो । “प्रेम, दया, करुणा, आत्मीयता, आत्मवतता, सत्य (ईश्वर) का मूल है। पाप मूल अभिमान । भेद भावीय, अहंकारीय, अन्यायीय, अत्याचारीय स्वरूप छोड़िये यही सर्वपिता जगत पिता के सत्य विधान न्याय नीति की सत्य पहिचान ॥ “
-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





