Spread the love

जब व्यक्ति अपना सत्य पथ भूल कर असत् कर्मों में रत हो जाता

  डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री” का विचार 

डॉ. बनवारी लाल पीपर “शास्त्री” ने मानव जीवन में उत्पन्न होने वाली मानसिक दिग्भ्रमितता और उसके गंभीर दुष्परिणामों पर गहन विचार प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार जब व्यक्ति अपने सत्य मार्ग को छोड़कर अनावश्यक, निरर्थक और व्यर्थ कार्यों में मन, तन व मस्तिष्क को उलझा लेता है, तब वह मानसिक भ्रम की अवस्था में पहुंच जाता है।

शास्त्री जी बताते हैं कि गलत मनोभाव और गलत अभ्यास मस्तिष्क में इस प्रकार छा जाते हैं कि व्यक्ति सत्य को त्यागकर असत्य में रमने लगता है। धीरे-धीरे यह स्थिति मानसिक रोग का रूप धारण कर व्यक्ति को जीवन के सही मार्ग से भटका देती है।

उन्होंने कहा कि अत्यधिक वैभव, धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा की अतृप्त चाह, दरिद्रता और मृत्यु का भय—ये सभी कारण व्यक्ति को मानसिक दिग्भ्रमितता की ओर ले जाते हैं। इसके चलते परिवार में भी उसका स्नेह व सम्मान कम हो जाता है और व्यक्ति मानसिक प्रताड़ना का शिकार होकर आंतरिक पीड़ाओं में घिर जाता है।

इस स्थिति में व्यक्ति जीवन के सही उद्देश्य से भटक जाता है और एक तरह से “जिंदा लाश” की तरह जीने लगता है। यदि समय पर उचित उपचार, पारिवारिक सहानुभूति और सलाह नहीं मिलती तो धीरे-धीरे यह स्थिति उसे पूर्णतः नष्ट कर सकती है।

डॉ. शास्त्री का कहना है कि इस प्रकार के मानसिक रोगों का मूल कारण व्यक्ति की अपनी सामर्थ्य से अधिक इच्छाएँ, अपेक्षाएँ और आत्मधैर्य की कमी है। उन्होंने परिवार से अपील की कि ऐसे व्यक्ति को समझदारी, प्यार और सहयोग देकर मार्गदर्शन करें और रोग की गंभीरता बढ़ने से पहले चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लें।

अंत में उन्होंने यह भी कहा कि यदि रोगी समय रहते अपने विवेक का प्रयोग करे और समझदार लोगों की सलाह स्वीकार करे तो वह आसानी से सामान्य जीवन की ओर लौट सकता है।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

Share.