आज दहेज के लालच में सामाजिक लोगों की मनो सोचीय खोखली मान्यताएं (क्योंकि आचार चरित्र कुछ और ,और वाह्य भाव विचारीय प्रदर्शनीय नाटक मीठे बोलने मधुरता का दिखाने का कुछ और ) मानव मन हृदय मस्तिष्क में गृह मुखिया व गृह मालकिन की मनोइच्छाएं अपने बच्चों के विवाह में लम्बी सूची सामान की व धन संपत्ति के डिमांड (मांग ) की कितने व्यक्ति हैं जिनकी बेटियां जवान 20 से 30 व 35 व 40 वर्ष की बिन ब्याही बैठी हैं ,चल रही हैं, जी रही हैं । अनुरूप मानो इच्छित वर पाने के लिए उनके माता-पिताओं के पास देने को वरपक्ष द्वारा मांग अनुसार धन नहीं है । सभी लोग धनपति नहीं हैं। यदि धनपति होते तो भारत के प्रधानमंत्री 80 करोड लोगों को फ्री में (मुफ्त में ) राशन, गल्ला खाद्य पदार्थ न बांटते । बेटी पक्ष वाले भी चाहते हैं कि मेरी बेटी जिसका रिश्ता एक जन्म के लिए होता है , हो रहा है । सही घर सही व सही वर मिल जाए जिससे वह सदा सुखी रहे और मैं सत्य मायने में एक बेटी के भार से, दायित्व से, कर्तव्य से निबट जाऊँ । धन संपत्ति वर पक्ष की मांग अनुसार देने को है नहीं । वर भले ही धनवान ना हो , बस किसी व्यवसन , ऐमाल से ग्रसित न हो और आलसी अकर्मण्य , मुफ्तखोर व हरामखोर ना हो । भले ही वह काम करने वाला कामीदा मेहनती हो। तो भी हम बिटिया के हाथ पीले कर दें और कर लें। आज उसी तरह से घर और वर मिलना कठिन और मुश्किल है । गरीब के पास कार्य व्यापार करने को पैसे नहीं हैं । लोन लेने का साहस नहीं है । पढ़े-लिखे होने के बावजूद देश में नौकरी है नहीं । बेरोजगारी निरंतर युवा पीढ़ी के लिए एक चुनौती बनकर सामने खड़ी है । कार्य धंधा सहज मिलना आज के दौर में अति कठिन रूप ले रहा है । ऐसे में बड़ा विडंबनामय जीवन भारत के युवाओं का और भारत की बेटे बेटियों का है, चल रहा है । यौवन की दहलीज पर बेटे बेटियां पैर रख रहे हैं । जवानी का जोश या तो कार्य नौकरी व्यापार में उन्नति परक विकास परक सिद्ध होता है अथवा बेकार भटकते हुए उल्टे सीधे, मान प्रतिप्रतिष्ठा सहित नष्ट करने वाले ,जीवन को बुरी राह , बुरे मार्ग की ओर ले जाने वाले आज भारत में दृष्टिगोचर हो रहे हैं । बेरोजगारी, मोबाइल का चलन इतना बढ़ गया है । कि माता-पिता के रोकने पर भी बच्चे मोबाइल के पीछे पागल स्थिति में आ गए हैं । आज माता-पिता बच्चों को हाथ से मोबाइल भी छीन लेते हैं तो बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं । अश्लील पोर्न साइटें बच्चों में, बच्चियों में , युवाओं में युवतियों में, वासनामयी हिलोरें उनके तन , मन , हृदय में मार रही हैं। बेरोजगार हैं, काम धाम है नहीं । फ्री दिमाग है ,मोबाइल हाथ में है , घर में कुछ हो या ना हो परंतु आज प्रत्येक बेटे बेटियों के हाथ में, युवाओं युवतियों के हाथ में मोबाइल अवश्य है। यह बच्चों के मनोभावनाओं को इतना भड़का रहा है । कि माता-पिता पर पढ़ाई के नाम पर मोबाइल लेने का दबाव पड़ रहा है । पैसा नहीं तो किस्तों पर ही सही और घर से नहीं तो बाहर से धन संपन्न परिवारी लड़कों युवाओं के माध्यम से ले लेना, लड़कियों युवतियों को मिल जाना। यह वीभत्स स्वरूप बालक बालिकाओं , युवा युवाओं, युवा युवतियों में ,आयु का भी प्रभाव , उम्र जवानी की ओर जा रही । विवाह की स्थिति सामाजिक दहेजीय इच्छाओं की आपूर्ति न होने कारण उम्र निरंतर बढ़ रही है । विषय वासनाओं का मनोभाव हृदय में जन्म ले रहा है । मोबाइल हाथ में पढ़ाई भी चल रही है और अश्लील पोर्न साइटें भी दिख रही हैं । नतीजा शरीर,मन और जीवन इंद्रियोंच्छित इच्छाएं भड़कने की कगार पर हैं। नतीजा अनाचार, दुराचार , व्याभिचार । आदर्श ,मर्यादा ,सभ्यता ,संस्कृति ,सामाजिक मान्यताएं सब धूल धूसरित हो रहीं हैं। कारण सामाजिक सत्य स्वरूप जो सर्व कल्याणीय व स्वकल्याणीय सत्य मायने में है । वह सामाजिक ठेकेदारों समाज के संभालने वाले उनके स्वयं आचार , और कथन करनी , बाहर कुछ और और भीतर कुछ और ।आज वही चरितार्थ चल रहा है , हो रहा है। कथा भागवद् , प्रवचन, धर्मान्धता, चरम सीमा पर हैं। परंतु आचरण चरित्र ,आदर्श , मर्यादा, सभ्यता ,संस्कृति चरम पतन की ओर । गिरावट की ओर, ह्रास और विनाश की ओर । आज वह श्री रामचरितमानस की चौपाई सर्व सिद्ध है व हो रही है । ” पर उपदेश कुशल बहु तेरे । जे आचरह ते नर ना घनेरे ॥ ”  अर्थात दूसरों को सीख देने वाले, राय देने वाले, समझाने वाले, शिक्षा देने वाले प्रायः बहुत लोग हैं । दूसरों को ज्ञान, सीख , उपदेश देना सरल है लेकिन स्वयं में अपनाना कठिन है। अन्ततः स्वयं उनका अनुकरण करने वाला कोई नहीं अथवा करोड़ अरबों में एकाद बिरला । आज भारत में नौजवान पीढ़ी बहुत ही अपने जीवन की बर्बादी की ओर बढ़ रही है । रोजगार है नहीं, काम धंधा के लिए अच्छी पूंजी नहीं ।बाजार में कार्य व्यापार अच्छे स्तर का नहीं । मोबाइल चरित्र गिराने , जीवन खाने की ओर बढ़ रहा है। नित्य प्रति अखबार में होने वाली,आने वाली घटनाएं हत्या , आत्महत्या , मर्डर चाहे बालक हो या बालिकाएं, युवा हो युवतियां सभी त्रस्त हैं । कहीं दुष्कर्म, कहीं व्याभिचार तो कहीं अन्याय अत्याचार यह स्थिति भारत की है । भारत के जनमानस की है । बच्चों को जन्म देने वाले, पालन पोषण करने वाले माता-पिता , भाई-बहन समस्त परिवार त्रस्त हैं। आज इन्हीं गलत आचारों का दंश झेलने में । कैसी विडम्बना है शासन सत्ता की । राज तंत्र की, न्याय तंत्र की, समाज की । छद्मीय छलीय मान्यताओं की । भारत देश की साख भारत में, इन स्थितियों कारण दांव पर लगी है । भारत को विश्व गुरु बनाने के सपने देखने वाले पहले भारत से छल, छद्मयुक्त , झूठ , पाखंड प्रोपेगंडाचार, जातिवाद मिटाएं खत्म करें। न्यायी व्यवस्था का पक्षपाती आचार मिटाएं , खत्म करें ,जातिवाद मिटाए खत्म करें । मानव जीवन की लोभ लालसाओं पूर्ण इच्छाओं का दमन आचार बनाएं । सत्य आचार का विस्थापन करें । भ्रष्ट आचार कूटनीति छल छद्म, झूठ पाखंड नीति का समापन करें । अपने स्वयं का आचरण चरित्र अपने दामन के दाग मिटाएं, धोएं, समाप्त करें । जिससे भारत भ्रष्ट आचरण से पूर्णतया मुक्त हो । अन्याय अत्याचार से मुक्त हो । चंडाल चौकड़ी का पक्षपातीय आचार भारत में खत्म हो अथवा खत्म करें । तभी ही भारत का भविष्य में विश्व गुरु बनने का सपना सच हो सकता है । अन्यथा कुटिलपन, कपटीपन, छल, छद्म, झूठ, पाखण्डपन । तन में कुछ, मन में कुछ , कर्मआचार में कुछ ये ही बुद्धवादी लोग विवेकीय लोग यदि सत्य का नाटक दिखाते हुए भ्रष्टाचारीय चरित्र व असत्य को अपनाएंगे । इस तरह राज सत्ता तंत्र ,शासन व्यवस्था तंत्र,  न्यायपालिका देश का संचालन करेगी व होगा तो भारत देश विश्व का गुरु तो नहीं । देश विनाश का कारण अवश्य होगा , बनेगा । और विश्व गुरु का सपना ,सपना ही बना रहेगा । तुलसी या संसार में जग की उल्टी रीति औरन को गैल बतावें आपन नाकें भीत ॥ “ भ्रष्ट आचार , भ्रष्ट चरित्र वह दीमक है जो स्वयं को तो खा ही जाती है साथ ही आसपास व दूर तक अपना कुपरिणाम छोड़ती है । हे भारत में के राजतंत्रीय सत्ताधीशों छल, छद्म , झूठ , पाखंड, अन्याय, अत्याचार ,धोखा , दगा, विश्वास घात की राजनीति छोड़ दो , कुटिल नीति, कपट नीति छोड़ दो । यह ऐसी दीमक है जो तुम्हें भी नहीं बख्शेगी और ना ही भारत के जनमानस को । यह फार्मूला अति घातक , अति विषैला है जो स्वयं से भारत के जनमानस को भी खा जाएगा । यह सूक्ति चरितार्थ मत करो हम तो डूबेंगे ही सनम परंतु तुम्हें भी साथ में डुबाएंगे / डुबा कर ही छोड़ेंगे । ।   अभी हल्की विनाशीय आहट है । पूर्ण विनाशीय नहीं । समय रहते चेत जाओ इसी में ही हम सबका हित है । श्री रामचरितमानस की वह चौपाई सिद्ध मत करो जो कुपंथ पग धरे खगेशा, रहे न तेज, बल ,बुद्धि लव लेशा ॥ ”  जागो मेरे प्यारे भाइयों, जागो भी आत्मिक बंधुओं , जागो मेरी माताओं , बहनों ,बेटियों , गृह लक्ष्मियों । हम सभी की जागृति पर ही राष्ट्र विनाश , मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) विनाश रुकना संभव है अन्यथा हम सब देशवासी विश्वविनाश की ओर बढ़ रहे हैं ।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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