युवा पीढ़ी के नौजवानों तुम्ही आत्म दीपक हो

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रिपोर्ट: डा ० बनवारी लाल पीपर ” शास्त्री “

f@ocusnews24x7.com 

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युवा पीढ़ी के नौजवानों सत्य संयम आचरण ब्रह्मचर्याचरण की सत्य साधना द्वारा परिपूर्ण करो

  • नौजवानों पूर्ण स्वस्थ्यता सबलता शक्तिशालिता प्राप्त करना व सत्य ज्ञान रूपी विद्या अध्ययन करना ही मात्र तुम्हारा सत्य उद्देश्य
  • अपनी ही सद बुद्धि सद विवेक सदज्ञान की धारा दृष्टि दर्शन से देखना होगा, बनाना होगा, सुधारना व संभालना होगा

हे मेरे देश भारत व विश्व के आत्मप्रिय बालक बालिकाओं युवा पीढ़ी के नौजवानों तुम्ही अपने भावी भविष्य के स्वआत्म कल्याणीय आत्म मंगल स्वमंगल करणीय / आत्म दीपक हो I बाल्यकाल से युवा काल तक का समय तुम्हारे शरीर निर्माण अर्थात पूर्ण स्वस्थ्यता सबलता शक्तिशालिता प्राप्त करना व सत्य ज्ञान रूपी विद्या अध्ययन करना ही मात्र तुम्हारा सत्य उद्देश्य, सत्यधर्म व सत्यकर्तव्य है। इसे सद् सत् सत्य संयम आचरण ब्रह्मचर्याचरण की सत्य साधना द्वारा परिपूर्ण करो । देखो तुम्हे अपने को अपनी ही सद बुद्धि सद विवेक सदज्ञान की धारा दृष्टि दर्शन से देखना होगा, बनाना होगा, सुधारना व संभालना होगा। बाह्य जगत के आत्मविनाश में डूबे आत्मघाती, सर्वघाती लोग अश्लील , कामी , विषयानुरागी, कामोपरक सैक्स परक सामग्री अश्लील साहित्य , अश्लील सीरियल, अश्लील फिल्में काम /सेक्स दृश्यपूर्ण संवादपूर्ण सिनेमा तथा सी ० डी ० / डी ० वी० डी ० कैसिटों के माध्यम से एवं वार्तापूर्ण स्वरूपों में / स्वरूपों से पश्चिमी संस्कृति चरित्रहीनता व आदर्श  मर्यादा विहीनता को बढ़ाने वाली संयम आचरण पर कुठाराघात करने वाली यौवन नाश करने वाली आप बालक बालिकाओं व नौजवानों को परोसने में अपनी लाज शर्म हया एक तरफ रखकर आधुनिकता का रुप बताते हुए बड़ी बेशर्मी से तीव्र गति में प्रचार प्रसार करने में तनिक नहीं हिचक रहे हैं | ऐसा प्रतीत होता है कि मां बहिन बेटी के सत्य स्वरूप का अस्तित्व संसार के अस्सी प्रतिशत मनोमस्तिष्क से धूल धूसरित अथवा धूमिल होता चला जा रहा है।

सभी प्रेम प्रसंग अर्थात काम भाव से प्रेरित हैं और नारी (मातृशक्ति) को अपने सत्यज्ञान, सद् बुद्धि सद् विवेक के सत् नजरिये को खोते हुए माता बहिन बेटी के रुप में देखने की शक्ति हृदय मनोमस्तिष्क में कामुक भाव की प्रबलता होने के कारण निरंतर  खोते जा रहे हैं गंवाते जा रहे हैं।

यह हम सभी के लिये व बालक बालिकाओं युवा पीढ़ी के लिये अत्यंत घातक आत्मविनाशक भारत सभ्यता संस्कृति मर्यादा नाश की स्थिति है। जिसकी संभाल का भार तुम सभी बच्चों पर सर्वप्रथम है क्योंकि  सत् चरित्र व सत् आत्म शक्ति व सत्य ज्ञान के प्रादुर्भाव का विकास बालपन व युवा स्वरूप में ही सर्वप्रथम अपेक्षित है।

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सत् चरित्र व सत् आत्म शक्ति व सत्य ज्ञान के प्रादुर्भाव का विकास

बालपन व युवा स्वरूप में ही सर्वप्रथम अपेक्षित है। 

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उपरोक्त स्थितियों में बालक बालिकायें युवा जगत के बच्चों में मानसिक खोखलापन, बुद्धिहीनता,पथभ्रष्टता, निरंतर बढ़ रही है जो तुम सभी बच्चों को अपने सत् कर्तव्य पथ से भटकाने में अग्नि में घी डालने / पोटाश डालने जैसी भूमिका बना रही है । यह बच्चों के लिये आत्मघाती सर्वविनाशी कदम है I

राष्ट्र / विश्व की शासकीय सत्तासीन लोग जो स्वयं अपनी इन्द्रियों के गुलाम हैं विषय भोग के रास रंग में डूबे रचे पचे लोग है। जो स्वयं अपने आदर्श मर्यादा संस्कृति की सच्चरित्रता को भूले हैं जिन्हे अपने सत् कर्तव्य पथ का स्वयं ज्ञान व होश नहीं है वे बच्चों का बालक बालिकाओं का युवा स्वरूपों का सत्य धर्म / सत्य कर्तव्य पथ क्या जानेंगे क्या बतायेंगे क्या बनायेंगे।                                                             हे मेरे प्यारे बच्चों यहाँ यथार्थ में सत्य स्वरूप में स्वस्थ्य शरीर बनने बनाने में सत्य सद् आचरण युक्त सद् विद्या ज्ञान अर्जन कसे कराने में कहीं कोई सत्य सहयोगी सत्य मार्ग दृष्टा तुम्हारा अपना कोई नहीं है मात्र तुम ही अपने सत्य आत्म निर्माण के स्वयं अकेले आत्म साधना के पथिक और स्वयं मार्ग सृष्टा हो।

सभी काम / सेक्स की गंगा में बहे चले जा रहे हैं तभी तो जगह जगह गली गली अश्लीलता अमर्यादितता अनाचारता अपने पैर पसारती चली जा रही है।

और सभी उसे देखते और उसकी अनदेखी करते चले जा रहे हैं। तुम देख रहे हो पढ़ रहे हो मदिरा पान करने वाले अधिकांश रुप में पिता भाई मां बहिन बेटी के पावन पवित्र रिश्ते को कलंकित कर रहे हैं।

फिर नाते रिश्तेदार व संसार समाज जनों की बात ही छोड़िए।

अतः इस विषय पर तुम सभी बालक बालिकाओं युवा जनों को स्वयं पूर्ण आत्मजागरूकता से सत्य तत्वानुवेषियों की दिशा धारा अनुसार इस आयु में मात्र विद्या साधना व शक्ति साधना  की ही मात्र सीमा में बंध कर पच्चीस वर्ष तक समाज के दूषित मनोभावी परिवारीय जन , नाते रिश्तेदारीय जन , समाज जन की ऊल जलूल अनावश्यक वार्ता, मनोविनोदीय हँसी मसखरी कामुक विचार भाव वार्ता स्वरूप व दृश्यावलोकन से हमें व तुम्हे सभी को प्रकृति प्रतिकूल इस प्रक्रिया से सदैव बचना है। अपनी स्वयं ही अपनी आत्म रक्षा करनी है व स्वयं ही आत्म संभल  आत्म होश व आत्म सत्कर्तव्य का पूर्ण पालन करना व रखना है।

तभी हम व आप सभी बच्चों युवाओं अपरोक्त आत्मघाती आत्म विनाशी विभीषिका से बाहर निकल कर अपने भावी उज्जवल भविष्य निर्माण व उच्च सत्य विकास का मंगल स्वप्न देख सकते हैं व मंगल कामना कर सकते हैं।

अन्यथा वर्तमान में सर्व समाज में फैली इस काम / सेक्स मनोभावी स्थिति का सामना बालक बालिकाएं युवा जन सभी के माता पिता इज्जत प्रतिष्ठा मान मर्यादा गंवाते हुए अपने अपने बच्चों के प्राण भी गंवा रहे हैं तथा धर परिवार की सुख शांति भी खतम हो रही है

बलात्कार गैंगरेप, हत्या, आत्महत्या, मर्डर,समाचारपत्र में,गली व मुहल्लों में प्रति दिन देखे व सुने जा रहे हैं।

यह बड़ी दुःखद स्थिति है ।

सत्य धर्म युक्त सात्विक स्वरूप अनुसार पच्चीस वर्ष की आयु तक बालक बालिकाओं युवाओं को कहीं किसी प्रेम प्रसंग काम विकार भाव में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए और न ही उस ओर देखना चाहिए I

मात्र शरीर साधना और विद्या साधना ही उनका सत् कर्तव्य व सत्य धर्म है।

बच्चों आत्म संभाल व आत्म कल्याण हम और आप सभी के हाथ में है। तभी तुम सभी बच्चों की युवाओं की जान व जीवन रक्षा सही ढंग से जीवन संचालन में संभव है l

जागो और मेरे इस सद लेख का वैचारिक सत्य आत्म चिंतन व सत्य आत्म मंथन करो

आप सद्बुद्धिमान हैं उचित प्रतीत हो तो पालन धारण व मानन करो।

पूर्ण सत्य अवसर आपके साथ व आपके हाथ हैं।                                                                                                      –

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