मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) का घर परिवार का या मंदिर,मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का भोग , प्रसाद , आहार,भोजन, भंडारा इसलिये ग्रहण नहीं करता हूँ । कि लोग अन्यायी अत्याचारीय, भ्रष्ट्राचारीय अनैतिक आचरण से जनमानस से धन दोहन करके भोग प्रसाद लाता है ,बनाता है , चढ़ाता है और फिर खिलाता है। आज वर्तमान में सृष्टि पटल का ज्यादातर मानव संवेदना विहीन, अन्याय, अत्याचार , अनाचार, दुराचार , भ्रष्ट्राचार अनीति में लिप्त होकर धनार्जन करते हैं । आत्मीयता, मानवता का तनिक भी पालन अपने जीवन कार्यशैली में अपने जीवन कार्य व्यवहार में , अपने जीवन कार्य व्यापार में एवं शासकीय नौकरी में अथवा सत्तारूढ़ पद प्रतिष्ठा में विस्थापित होकर मनमाना अनैतिक कार्य व्यापार,लूट खसोट, सामाजिक व्यवस्था नीति में करना इन सब गलत तरीकों से कमाई धन सम्पत्ति का उपयोग घर परिवार स्वयं का निर्वहन करना और परमेश्वर के नाम पर मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा पर दान भोग (प्रसाद ) चढ़ाना । ऐसे अनैतिक धन का लाया हुआ बनाया हुआ खाद्यान्न, मिष्ठान, भोग, प्रसाद बनाकर परमेश्वर को चढ़ाना भंडारा करना और संसार के लोगों को खिलाना, बांटना । मैं ऐसे मिष्ठान खाद्यान्न को जो अनैतिक धन से लाया गया, बनाया गया, चढ़ाया गया । इसे मैं भोग प्रसाद नहीं मानता हूँ । यह परमेश्वर के साथ धोखा व स्वयं तथा समाज मानव के साथ छलावा, झूठ , पाखण्ड है। यह व्यक्ति (नर-नारी , स्त्री-पुरुष) द्वारा गलत सोचीय मनमानीय उपज है । ऐसा भोग प्रसाद ईश्वर नियम नीति सत्य आचार अन्तर्गत परमेश्वर का प्रसाद नहीं है ना ही भोग प्रसाद है। ऐसे भण्डारों का अन्न ग्रहण करना तथा अनैतिक धनोपार्जन से मंगाया गया बनाया गया खाद्यान्न मिष्ठान सब विष तुल्य है जो खाने व ग्रहण करने वालों के संचित पुण्य को भी खा जाता है। यह देखिए ग्रन्थों का प्रमाण – महाराजा भर्तहरि का कथन है “कीचड़ को चुभोकर साबुन से सफाई करने की अपेक्षा कीचड़ को ही न चुभोया जाये । शास्त्रोक्त प्रमाण – दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठति । यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम् ॥ (आंगिरसस्मृति ५८) अर्थात् मनुष्य का सारा पाप उसके अन्न में स्थित होता है। अतः जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भोजन करता है। आचाराल्लभते ह्यायुराचारा दीप्सिताः प्रजाः ।आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
परमेश्वर सत्य आचार की शक्ति – मनुष्य आचार से आयुको प्राप्त करता है , आचार से अभिलाषित सन्तान को प्राप्त करता है , आचार से अक्षय धन को प्राप्त करता है और आचार से अनिष्ट लक्षण को नष्ट कर देता है। अतः पूर्ण परम सत्य नीतियुक्त कमाई ही सत्य बुद्धि विवेक और सत्य धनधान्य वैभव सम्पत्ति की वृद्धि करती है। पूर्ण परम सत्य सुख आनन्द व पूर्ण परम सत्य आत्म संतोष प्रदाता है। मनुष्य यदि पूर्ण परम सत्य आत्म साधना से परम आत्मा सत्यआचार से धनार्जन करे तो वह इस लोक से लगाकर परलोक तक परमसत्य आत्मशान्ति और आत्मसंतुष्टि को प्राप्त करता है।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





