हे मूर्ख मानव ! (नर-नारी, स्त्री-पुरुष ) क्यों अपना दुःखदर्द लिये धूर्त, पाखण्डी, अन्यायी अत्याचारियों के चक्करों में मारे-मारे कष्ट उठाते फिर रहे हो ? उनके पास शारीरिक-मानसिक,  देहिक, आर्थिक, श्रमिक शोषण होने के अलावा कुछ नहीं मिलेगा । छद्मीय, छलीय व्यक्ति संत वेषीय पाखण्डीय आवरण ओढ़े समाज के लोगों को व हम सभी मूर्खों को भरमा रहे हैं व भरमाने काम कर रहे हैं। अपने स्वयं से अपने सत्य कर्म सुधारो । अपने सत्य कर्म ,कर्तव्य , दायित्व, जहाँ जैसे बनते हों माता -पिता के प्रति, भाई बहिन , पत्नी संतानों के प्रति,संसार मानव आत्मिक भाईबंधुओं के प्रति, माताओं , बहिनों , बेटियों के प्रति , कार्य व्यापार नौकरी के प्रति । बस उन्हे पूर्ण परम सत्य ईमानदारी से सत्यीय पारदर्शिता पूर्ण ढंग से उनका सत्य निर्वहन करो। जगद् पिता जगद् माता के सृष्टिपटल पर अस्तित्व को पहिचानते हुए जो सृष्टिपटल पर इन्हीं उपरोक्त कार्य स्वरूपों, कार्यदायित्वों में समाया है अथवा दृष्टि गोचर है जो तुम्हारे हर पल की कर्म आचारीय गतिविधि देख रहा है और उसी अनुसार तुम्हे परिणाम दे रहा है। “ईश झरोखे बैठकर सबका मुजरा लेय । जाकी जैसी चाकरी ताको तैसा देय ॥ रोम रोम में रमने वाला राम न मारे काहू ए , दोषी नहिंया रोम रोम में रमने वाला राम । आप ही से मरि जात हैं, कर-कर खोटे काम ॥ “ सत्य आचार ही उसकी सत्य पूजा है । जप है , तप है , साधना है, आराधना है। मारे-मारे फिरने से इन धूर्तों , पाखण्डियों , छली छद्मियों के पास जो लाल पीला चोला धारण किये, संत जैसा वेष बनाये, चतुर चालाकीयतामयी विद्वता का आडम्बर ओढ़े पांच विकारों ( काम ,क्रोध , लोभ, मोह, अहंकार ) के गुलाम , बाहर से मधुर वाणी वाक्पटुता के धनी और भीतर तन मन मस्तिष्क इन्द्रियों में शैतान बसाये दानवीय स्वरूप धारण किये जगह-जगह धर्माडम्बर ओढ़े बनाये , विस्थापित किये ठगलूट रहे हैं। इन धूर्तों के पास कहीं कुछ नहीं मिलेगा, ना कुछ बनेगा । बनेगा तो मात्र अपने सत्यकर्तव्य दायित्व को पूर्ण परम सत्य ईमानदारी से पालन, निर्वहन में। मेरा यह स्वयंका व्यक्तिगत सत्य अनुभव है ,सत्य अनुभूति है। सत्य से सत्य पर चलने पर स्वयं व घर परिवार को भूखे रहना नहीं है और भूखों मरता नहीं है । धनधान्य की पूर्ति अच्छे से होगी व होती है। साथ फूटी कोड़ी जाना नहीं । परमेश्वर परमसत्ता , सर्वोच्च सत्ता पूर्ण लाज रखता है। पूर्ण परमसत्य आवश्यकीय रूप स्वरूपों की प्रतिपूर्ति परमात्मा अच्छे से करता है। अतः बंद करो छद्मियों, पाखण्डियों के पास आना जाना , चक्कर लगाना, धक्के खाना और भीड़भाड़ में मर जाना। आत्मधैर्य से, आत्मशान्ति से, आत्म ईश विश्वास से, आत्म सत्य कर्तव्य-दायित्व की प्रतिपूर्ति से, आत्म पौरुष पुरुषार्थ से, आत्म श्रम साधना से, आत्मा के सत्य दिग्दर्शनीय स्वरों के आत्मसात से और अपने स्वयं के पूर्ण परमसत्य आत्मविश्वास से । बगैर कहीं किसी का आश्रय लिये , किसी से कोई भी अपेक्षा किये, देखे,झांके, पीछे पड़े, दौड़े, भागे, भटके , भटकाये, स्वयं से हस्तगत करो । परमेश्वर के अलावा कोई भी धूर्त पाखण्डी कभी भी किसी का भी दुःख , कष्ट , संकट काटने वाला न कभी कोई सृष्टि के उद्‌भव काल से आज वर्तमान तक न कोई हुआ है और न कोई होगा इस सत्य को सत्य से जानो ।  “कोऊ न काहू को सुख दुःख कर दाता । निज कृत कर्म भोग सब भ्राता । । कर्म प्रधान विश्व रच राखा, जो जस करे तो तस फल चाखा ॥”  हे मानव ( नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) ज्यादा पाने की इच्छाओं को त्यागो और आवश्यकीय आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति उपरोक्त वर्णित आचार के सत्य पालनीय स्वरूप से जगद्‌  पिता जगद्‌ माता अवश्य ही १००% पूर्ण करता है और करेगा इस सर्वोच्च सत्ता विश्वास से सत्य जीवन बनाओ और जिओ । अनरगल अनीतिपरक स्वरूपों को अपना कर धनवृद्धि का, समापन, विनाश स्वयं की दुराचरणीय मनोवृत्तिधारी संतानें ही करेंगी । और हे मानव तुम अपने कृत्यों का गलत तरीकों से, धोखादगा से, अन्याय अत्याचार से, झूठ फरेब से इकट्ठी की गयी अनीति परक सम्पत्ति का और अपनी औलादों के कुकर्मों का हश्र वृद्धावस्था में जर्जरावस्था में तिल तिल गल कर देखोगे , रोओगे , तड़पोगे । अतः आज समय है अभी भी संभल जाओ , सुधर जाओ और सत्य जीवन बनाओ व सत्य आनंदमयी जीवन जिओ और पूर्ण सत्य आत्म संतोष पाओ । “दुनिया ऐसी बावरी भटकी- भटकी जाये । यदि अपने सत्यकर्तव्य दायित्व सत्य से पालन करे तो जीवन की सारी भ्रम भटकनी मिट जाये ॥ “

“नेकी तेरे साथ चलेगी, रहेगी भैया, एक समय वह आयेगा जब तू छू न सकेगा धन दौलत और रुपैया । जिनके लिए तूने अनैतिकता से महल बनाये, वे न तुझे ठहरायेंगे । जो तुझको कहते हैं सुन्दर,देख तुझे घबरायेंगे । आग पे इकदिन सो जायेगा , बनके धुंआ तू खो जायेगा । याद में तेरी आंसू बहाकर जीवन कोई न खोयेगा, एक सितारा टूट गया तो ,आसमान क्या रोयेगा । । “

“कर रहा है मनुष्य पाप किसके लिए , जिंदगी है अरे चार दिन के दिन के लिए । क्या विचारा कभी अपने मन से सोच विचार किये, कर रहा है मनुष्य पाप किसके लिए । जिंदगी है अरे चार दिन के लिए ॥ “

” बस्ती – बस्ती,पर्वत-पर्वत गाता जाये बंजारा, लेकर दिल का इक तारा । पल दो पल का साथ हमारा, पल दो पल की यारी आज रुके तो कल करनी है चलने की तैयारी । कदम-कदम पर होनी बैठी अपना जाल बिछाये , इस जीवन की राह में जाने कौन कहाँ रह जाये , कौन कहाँ रह जाये । धन दौलत के पीछे क्यों है ये दुनिया दीवानी , यहाँ की दौलत यहीं रहेगी साथ नहीं है जानी । जीवन के सत्य को सत्य सेे जानो हेे मेरे प्यारे आत्म बंधु अंजानी ॥ “

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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