घर परिवार के किसी भी सदस्य ने कोई छोटा या बड़ा अपराध कृत्य किया है और वह घर से भाग जाता है अथवा घर से भाग गया है तो पुलिस वांछित अपराधी को पकड़ने के लिए घर से बाहर होने पर, अज्ञात होने पर घर परिवार, मातापिता, पत्नी , बच्चे , भाई-बहिन, नातेरिश्तेदारों के प्रति अति अन्याय पूर्ण मारपीट करना, उन्हें डराना धमकाना या उन्हें प्रताड़ित करते हुए पकड़कर ले जाना तथा अपनी हिरासत में रखना, पुनः बार-बार उपरोक्त लोगों को अपराधी के न मिलने पर हड़काना व यातनाएं देना। यह अति अमानवीय व न्यायनीति से परे पुलिस का कृत्य है। यह पुलिस का निरपराध, निर्दोष लोगों के साथ अन्याय अत्याचार परक दुर्व्यवहार है। जो पुलिस विभाग अथवा अधिकारियों के लिए यह न्याय संगत नहीं है। 90% (नब्बे प्रतिशत ) कोई भी पिता-माता, भाई-बहिन या पत्नी पुत्र अन्य परिवारीय सदस्य कभी भी यह नहीं चाहेगा कि उसका पुत्र, भाई , पति या बाप अपराधीय कृत्य करे या अपराधों में प्रवृत्त हो। जहाँ तक नाते रिश्तेदार भी नहीं चाहेगा कि उसका रिश्तेदार अपराधपूर्ण कार्य या व्यापार करे । इसमें ज्यादातर भूमिका अपराधी व्यक्ति की मनो प्रवृत्ति , मनोसोच या गलत लोगों की संगत, साथकी ज्यादातर भूमिका होती है व रहती है। घर परिवार का कोई भी पारिवारिक आदमी (नर-नारी , स्त्री- पुरुष ) इसमें ज्यादातर अंशमात्र भी भागीदार नहीं होता है। परन्तु पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। जो अत्यन्त खेद जनक और पूर्णतया निंदनीय व अन्यायपरक है। इस पर पुलिस विभाग , अधिकारी व कर्मचारियों को अपना व्यवहार जो यथार्थ रूप में परन्तु सत्य रूप से, ईश्वरीय दृष्टिदर्शन से अतिदोष पूर्ण है, सुधारना चाहिए। हम सभी लोग परमेश्वर जगद् पिता जगद् माता की छत्र छाया में रहते हैं, पलते हैं, बसते हैं, उनकी दयाकृपा हम सब पर सदैव भरपूर रहती है, होती है, चलती है। हम सभी को अपने कर्तव्य दायित्व सत्य रूप में पूर्ण ईमानदारी से निभाना ही है। अपराधी जिसने सत्यरूप से अपराध किया है ? वह पुलिस से दूर कितना भी भागे एक न एक दिन अवश्य ही पकड़ में आयेगा ही। वह सामाजिक दोषी तो है ही क्योंकि उसने अपने आत्मवत् भाइयों के साथ, माता – बहिन – बेटियों के साथ चोरी, डकैती, लूट, हत्या , मर्डर, बलात्कार जैसे जघन्य दोषपूर्ण अपराध किये हैं उन्हे परमेश्वर कभी भी माफ नहीं कर सकता है। जो पाप कृत्य स्वरूपीय हैं । उसे अपने पाप कृत्यों का भुगतान तो अवश्यही यहाँ अदालत में ही नहीं वहाँ जगद्‌पिता, जगद्‌ माता की अदालत में तो भोगना ही पड़ेगा व भोगना पड़ता है। जो किसी न किसी रूप के दण्ड भोगने के रूप में अपराधी द्वारा दण्ड भोगना परिलक्षित होता है अथवा दृष्टिगोचर होता है। परन्तु पुलिस विभाग को सामाजिक रक्षकों को घर परिवार के निर्दोष लोगों पर अन्याय अत्याचार से अवश्य ही बचना चाहिए अथवा उन पर अंशमात्र भी अन्याय अत्याचार नहीं करना चाहिए । क्योंकि निर्दोषों पर अन्याय अत्याचार करना ईश्वरीय नीतिनियम विधानीय दृष्टिदर्शन से अपराध पूर्ण व दोषपूर्ण कृत्य है। इसका समाज रशकों को अथवा पुलिस विभाग को अवश्य ही ध्यान रखना चाहिए। किसी को भी कहीं किसी से भी नहीं डरना है। परन्तु ईश्वर जगद्पिता जगद्‌ माता उस परमपिता से अवश्य ही डरना चाहिए जो सर्वोच्च न्यायदाता है। यहाँ धन, घूस , दबाव या पावरफुल कार्य व्यवहार से अन्याय को भी न्याय में बदल दिया जाता है और न्याय को अन्याय में। परन्तु ईश्वरीय सत्ता न्यायदर्शन नीति में कहीं कोई उसके सत्य न्याय से बचने की अंशमात्र भी कोई गुंजाइश नहीं है। यह माना जा सकता है कि दस प्रतिशत अपराधी व्यक्ति के साथी सहयोगी परिवार के सदस्य हो सकते हैं। और वे भी वह जो स्वयं अराजक स्थितियों के शिकार हों या घर परिवार की गरीबी, भुखमरी के शिकार होने पर, रहने पर अपराधी का साथ देने वाले हों या स्वयं में गलत आदतों के शिकार हों जैसे जुआ ,शराब या अन्य असामाजकीय अज्ञान जनित दोषपूर्ण कर्म अथवा कार्यों से ग्रसित हों। परन्तु नब्बे प्रतिशत कोई पिता-माता, भाई-बहिन, पत्नी या समझदार पूर्ण परिपक्व संतानें कभी नहीं चाहेंगी कि उनका निज परिवार सदस्य कोई भी छोटा बड़ा चोर ,डकैत , अनाचारी, दुराचारी या हत्या करने वाला बने, रहे, पले या चले या हो। अतः सभी लोगों को परमेश्वरीय छत्रछाया में रहना है, चलना है अथवा जीवन जीना है व मरना है। अतः परमेश्वर के न्यायिक दण्डीय स्वरूप से सदैव अवश्य ही डरना चाहिए तथा पूर्ण परम सत्य ईमानदारी परक सत्य कर्तव्य दायित्व पूर्ण ईमानदारी से निभाना चाहिए। निर्दोषों को अंश मात्र भी दुःख कष्ट नहीं होना चाहिए एवं पद और शक्ति का बिल्कुल असत्य जनक दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। ” कबिरा असत्य न कीजिए काल गहे करि केश , ना जाने कित मारसी कि घर कि परदेश । । ” 

“कोई अमानवीय कृत्य न कीजिए परमेश्वर का यह संदेश। नहीं सात पाताल पर्त भीतर छिप जाने पर भी नहीं बचोगे कर्मों का परिणाम पाने से यह सर्वोच्च सत्ता जगद् ईश्वर का सत्य न्याय नीति परक आदेश ॥”

-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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