बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी। दु :ख हरौ द्वारिका नाथ शरण मैं तेरी ॥ दु:शासन वंश कठोर महा दुःख दायी। कर पकड़त चीर लाज नहीं आयी।। शकुनी दुर्योधन कर्ण खड़े दल घेरी। दुःख हरौ द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी ।।

महाभारत काल में एक दुर्योधन एक दुःशासन आज भारत में हजारों दुर्योधन और हजारों दु:शासन। राजतंत्र,सत्तातंत्र , न्यायतंत्र , प्रजास्वरूपीय तंत्र में जो सबल सशक्त , युवा, गुण्डातंत्र , जनगरा ( जिसके परिवार में 10-15 आदमी हों ) जवानी की ताकत रखने वाला , चोरी, डकैती, लूट, खसोट, मारपीट, बेईमानी करके, भयाक्रान्त करके , ऐन केन प्रकारेण अपनी शक्ति बल का राजतंत्र ,शासनतंत्र में घुसपैठ करके , दलाली के माध्यम से धन संग्रह कर लेने वाला दबंग गुण्डातंत्र , जिनका लाभ राजसत्ता शासन सत्ता में घुसे बैठे अपराधी मनोवृत्ति के महान व्यक्तित्व का तमगा लगाये वे भी उपरोक्त गुण्डों की सांठ गांठ से राजसत्ता तंत्र में पैर जमाये इस तरह की चंडाल चौकड़ी , प्रजा में विद्यमान दुर्बल, निर्बल , शारीरिक मानसिक शक्ति से, धन अभावी ( धनहीन) , अकेले, दुकेले कमजोर शरीरीय, अशिक्षित लोगों को भय दिखाये अपनी मनमानी, अपनी हर मनोइच्छा पर हर तरह का शोषण चाहे  भयाक्रांत करके रखना | बहिन बेटियों, माताओं, गृहलक्ष्मियों की लाज लूटने मे विरोध करने पर अति दुर्गति दुर्दशा से मार डालने में भी कोई दया करुणा न रखते हुए अतिअति आति क्रूरता की दिल दहलाने वाली क्रूर मयी सारी हदें पार कर जाना। यह स्थिति आज वर्तमान भारत की है। कैसे जिएं , कैसे मरें, कैसे लाज बचे। महाभारत काल  के भगवान श्रीकृष्ण मुरारी, हे गौओं के रक्षक दूध दही की धारा बहाने वाले , गौओं को वन में चराने वाले बनवारी। भारत में पुनः जन्मो करोड़ों द्रौपदी बहिनों की दुर्बल, निर्बल, अशिक्षित, निर्धन, कमजोरों की लाज बचाने आज इन राज सत्ता से लगाकर शासनसत्ता , न्यायसत्ता तथा प्रजासत्ता में बैठे हजारों दुर्योधन, हजारों दुःशासन, हजारों अन्यायी अत्याचारीय मनोवृत्ति धारीय क्रूर कंस , जरासंध, शिशुपाल, रुक्मी और द्रौपदी चीरहरण (वस्त्र निर्वस्त्र करते समय ) बड़े-बड़े वीर, त्यागी, तपस्वी, ज्ञानी , विज्ञानी , धनुर्धारी योद्धा , कुशल रणनीतिकार ,राजनीतिज्ञ जिनमें मुख्य गुरु द्रोणाचार्य, श्री कृपाचार्य , महात्मा भीष्म पितामह, श्री विदुर जी सभी सिर झुकाये मुँह लटकायें बैठे थे। परन्तु उस अन्याय अत्याचार का किसी ने प्रतिकार (विरोध ) नहीं किया। फिर लाज बचाने आये श्री गिरिवरधारी ।

दुःशासन वंश कठोर महा दुःख दायी। कर पकड़त मेरा चीर लाज नहीं आयी । दुःख हरौ द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी । बिन काज आज महाराज लाज गयी मेरी । दुःख हरौ द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी । । “

आज भारत में जगह जगह पर बैठे श्री राम और श्री कृष्ण की भक्ति का ढोंग करने वाले ? रावण और कंस की भूमिका , दुर्योधन दुःशासन की भूमिका, निर्वहन करने में तत्पर हैं और संलिप्त हैं। अन्याय,अत्याचार , छल छद्म, झूठ, पाखण्ड , धोखा दगा जोरों पर है। सत्य को असत्य बनाना व असत्य को सत्य बनाना अथवा सत्य को असत्य बताना व असत्य को सत्य बताना ज्यादातर लोगों की मनोवृत्तियों में यही समाया हुआ है। आओ अब भारत में फिर से आओ हे कृष्ण कन्हाई भारत में आकर अपनी सत्य उपस्थिति करो कराओ दिखलाओ। आओ भारत में फिर से आओ । दुर्बल, निर्बल, दीन , हीन, कमजोर इन उपरोक्तों की पीड़ा व घर परिवार में कम संख्यीय कमजोर युधिष्ठिर, अर्जुन,भीम , नकुल, सहदेव को बल देकर बलवान बनाओ । तथा सत्य ज्ञान नीति देकर हृदय का अज्ञान मिटाओ । आओ आओ ए कृष्ण कन्हाई आओ इस घोर अन्धकार को मिटाओ और जब तक यह अति असत्य गलत ना मिटे तब तक उपस्थित होकर रहकर सम्पूर्ण साथ निभाओ। आज हजारों अबलाएं, माताएं, बहिनें, बेटियां , गृहलक्ष्मियां , हजारों, लाखों करोड़ों दुर्बल, निर्बल, कमजोर, अशिक्षित धनहीन , श्रीहीन ,शक्ति हीन मानव भाई हैं । इन सब के अन्यायी अत्याचारीय चीरहरणको रोको सबकी लाज बचाओ । हे वंशी बजइया चक्रधारी, दुष्टों के संहारी हे श्री कृष्ण कन्हइया , यशोदामइया के छइया आओ आओ अब शीघ्र ही आओ। इन चतुर चालाक धूर्त पाखण्डी होशियार अन्यायी अत्याचारी दुष्टों से आकर लाज बचाओ। तुम्हारे बिना अब कोई सत्य नहीं दिखता सब जगह आज प्रजातंत्र में प्रजातंत्र नहीं। दुष्टों का तंत्र , गुण्डों का तंत्र , अराजक अमानवीय तंत्र , अन्यायी तंत्र , अत्याचारीय तंत्र , ऐन केन प्रकारेण , साम , दाम , दण्ड, भेद से व कूटनीति, कपटनीति, छलनीति, झूठनीति जिसे अपनाने में उन्हे कोई परहेज नहीं है ऐसे स्वरूपधारी अहंकारी विस्थापित हैं तेरे सृष्टिपटल में तेरी जन्मस्थली भारत के सृष्टि धरातल में । इन असत्यियों का संहार करो, प्रतिकार करो , लाज व जीवन तुम्हारे हाथों है इन दुष्टों का संहार करो।

बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी । दुःख हरौ द्वारिका नाथ शरण में तेरी । ।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

हम भारत की बेटी हैं , नंगे पैर कड़ी धूप में सर पे माटी ढोती हैं। हम भारत की बेटी हैं।।

कुछ दरिंदो के कारण पल पल इज्जत खोती हैं। हम भारत की बेटी हैं। ।

कहने को क्या रह गया , बाकी अब भी आंखे फूटी हैं। हम भारत की बेटी हैं।।

– साभार रचयिता डा० रमेश चन्द्र जी गुप्त

 

 

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