अपना जीवन दीप अपने आत्म अनुभव, आत्म अनुभूति से जलाएँ । महा आत्मा बुद्ध ने अपनी आत्म साधना की खोज में पाया इस सृष्टिजगत के मानव को अपने आत्म सत्य ज्ञान प्रकाश से अपना जीवन दीप अपने आत्म अनुभव , अपनी आत्म अनुभूति से स्वयं  जलाएँ । कहीं भी न भटकें न अपने को भटकाये, न धक्का मुक्की खायें , न पैसा अपव्यय में खर्च करें न भीड़भाड़ में अपना जीवन गंवाएँ । न किन्ही प्रवचनकर्ताओं से जो स्वयं पंच विकारों से ( काम, क्रोध , लोभ , मोह, अहंकार ) बिधे हुए हैं, छिदे हुए ही सत्य आचार के धनी नहीं हैं। अनाचार में लिप्त व सने हुए हैं। जिन्हे यदि नर्क और स्वर्ग कहीं है तो उन्हे अपने दुष्कृत्यों के कारण नर्क ही  प्राप्त होगा। उनके पास राष्ट्र जन मानस के लिए, विश्व जनसमाज के लिए कुछ पूर्ण व परम सत्य नहीं मिलेगा । ना ही कुछ सत्य (ईश्वर) हस्तगत होगा । सत्य आत्मकल्याण व सत्य आत्म मंगल होना संभव नहीं है। न आत्मसत्य मार्ग मिलेगा । इस पूर्ण व परम सत्य को जानों और जीवन रिस्केबल भ्रम भवाटिकी में न पड़ो। इस में कोई हानि की न मान की न सम्मान , न लाज की, न मर्यादा की, न स्वाभिमान की कहीं कोई न अर्थबरबादी की , न जीवनहरण , न प्राण हरण का कोई रिस्क है महाआत्मा श्रीबुद्ध का वह सूत्र सिद्धान्त मार्गदर्शन पूर्ण परम सत्य व सटीक है। कि “अप्पो दीपो भव ” अपनी आत्म ज्योति अपने ” पूर्ण व परम सत्य ज्ञान प्रकाश की ज्योति अपने जीवन के अपने जीवन में मिले स्वबुद्धि विवेक से स्व सही गलत , सत्य-असत्य, स्वयंकी काया व तन मन इन्द्रियों से हुए अच्छे बुरे मिले अनुभवों से सीखते हुए उनके प्राप्त परिणामों से सुख दुःख की हुई अनुभूतियों से अपने आत्मसत्य , ज्ञान प्रकाश का, जीवन का आत्मसत्य दीपक स्वयं जलाओ अथवा स्वय बनो और कहीं यहाँ वहाँ किसी का आश्रय अपेक्षा मत करो । किसी के आश्रय अपेक्षा की ओर मत ताको, म त झाको , मत दोड़ो मत भागो । किसी सत्य तत्ववेत्ता का यह कथन असत्य नहीं है। कि “कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूंढे वन माहि ” जैसे कस्तूरी हिरण की नाभी में होती है। उसे स्वयं में स्वयं से सुगन्ध आ रही है उसकी । परन्तु वह जंगल जंगल भटक कर उसे ढूंढ रहा है। इसी तरह वह परम पिता परम माता जो कण-कण में व्याप्त है सर्वत्र व्याप्त है। परन्तु मनुष्य (नर-नारी,स्त्री-पुरुष ) उसे तीर्थ स्थान व वन व जंगल-जंगल में ढूंढते फिर रहे हैं। परमेश्वर परमसत्ता सर्वोच्चसत्ता सर्वत्र व्याप्त है। जल में, थल में, अग्नि, पवन में, आकाश प्रकृति में, कहाँ नहीं उसका प्रकाश है। कहाँ नहीं उसकी छवि है। हिरणाकश्यप- प्रहलाद शास्त्रोक्त प्रकरण में हिरणाकश्यप ने जब वह प्रहलाद को मारने के लिए तत्पर था तब उसने प्रहलाद से कहा था कि बता तेरा भगवान कहाँ है ? बुलाले उसे आत्म रक्षा के लिए। तब परम सत्ता परमेश्वरीय सत्ता को मानने वाला प्रहलाद भी यही बोला था “मो मैं तो में खडक खम्भ में कहाँ नहीं है वह तो सर्वत्र व्याप्त है।” तो भइया मेरे प्यारे आत्म बन्धुओं। अपने मन मस्तिष्क दिल दिमाग से विचारो और पूर्ण सत्य मार्ग अपने स्वयंके जीवन के उत्थान पतन का जो स्वयं ही तुम्हारे बुद्धिविवेक, ज्ञान प्रकाश के ऊपर निर्धारित है। उसका संचालन तुम्हारे ही हाथ में है। अपने आत्म सत्य को स्वयं ही पहिचानों और स्वयं ही अपने आत्म सत्य ज्ञान प्रकाश की ज्योति अपने अन्तः करण में स्वयं ही अपने अच्छे बुरे रही गलत , सत्य असत्य किये गये / हुए असत्य कर्म त्यागते हुए सत्कर्मों को करते हुए प्रज्जवलित करो । जीवन तुम्हारा स्वयं से ही स्वयं के द्वारा सम्हल जायेगा क्योंकि व्यक्ति के स्वयं का ज्ञान प्रकाश ही अपने स्वयं की आत्म ज्ञान ज्योति ही आत्म अनुभूति परक सत्य ज्ञान प्रकाश ही तुम्हारी उन्नति का कल्याण का, आर्थिक वृद्धि का आत्म उद्धार का मूल स्रोत है । समझो, जानो, पहिचानो ” मोको का ढूंढो रे बन्दे मैं तो तेरे पास में हूँ ।” यह भी कथन किसी सत्यानुभूति परक ज्ञान प्रकाश पाने वाले किसी सत्य तत्त वेत्ता का ही है। एक मंसूर नाम का संत हुआ है जिसे परमात्मा स्वरूप ब्रह्म की इतनी व्यक्तिगत अनुभूति हो गई थी कि उसने कहा “अनल् हक- अनल् हक- अनल् हक ” अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ, मुझमें ही ब्रह्म है। संसार समाज के लोगों ने उसके सत्य को नहीं समझ पाया। और उसे सामूहिक रूप में पत्थरों से मार कर उसकी जीवनलीला समाप्त कर दी। संसार व संसार के लोग परम सत्ता सर्वोच्च सत्ता के सम्बन्ध में सदैव भ्रमशील रहे और संसार के लोगों को भी परम सत्य से सदैव भटकाते रहे हैं और भटकाते आये हैं और स्वयं भटकते रहे हैं । ज्यादातर जो मानव जीवन के संचालन का सत्य है उसे शास्त्रों में विद्वानों ने निम्न रूप से व्यक्त भी किया है ” कोऊ न काहू का सुख दुःख कर दाता , निजकृत कर्मभोग सब भ्राता ॥” “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा,जो जस करे तो तस फल चाखा ॥ ” का प्रकृति स्वरूप दाता, विधाता, सृजन कर्ता , पालनकर्ता, संहारकर्ता मात्र परिणाम दाता है। वह तो पूर्ण परम सत्य , दयालु ,कृपालु , सर्वसत्य प्रेमी , सर्वसत्य स्नेही , सर्व सत्य करुणामयी , सर्व दयामयी, सर्व हितकारी, सर्व कल्याणी, सर्वमंगल दाता है। वह किसी भी जीव प्राणी मानव का अहित नहीं करता है। सर्व रक्षक है, सर्व आत्मवत् आत्मवान है , सर्वआत्मवत दयावान है । कष्ट ,दुःख , परेशानियां मात्र हमारी अज्ञानता जनित कुकृत्यों के परिणाम हैं। इस सत्य को जानों मेरे परम प्रिय सत्यप्रिय आत्मवत् स्वरूप आत्मिक बंधुओं । “अप्पो दीपो भव” अपना जीवन आत्म कल्याणी दीप अपनी स्वयं आत्मानुभूति पर प्रज्वलित करो। यह महामानव महात्माबुद्ध का आत्म सत्य साधना का आत्म परिणामीय सत्य सन्देश है । जो कहीं किसी अन्य को भटकने से बचाने के लिए किसी भी अन्य के आश्रय के ताकने झाकने के लिए किसी के द्वारा शारीरिक मानसिक आर्थिक शोषण से बचने के लिए महात्मा बुद्ध का अमोघ परमसत्य मूल मंत्र हैं । जिससे मानव जीवन का सत्य विकास आर्थिक शारीरिक, मानसिक रूप से ही व स्वयं से ही स्वयं के बुद्धि विवेक से ही अपना आत्म दीपक स्वयं बनो और स्वयंही आत्म ज्ञान की ज्योति स्वयं ही जलाओ। अर्थात् ” अप्पो दीपो भव ॥”

– डा० बनवारी लाल पीपर ” शास्त्री”

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