भारत में शासकीय प्रत्येक विभाग की निर्धारित आचार संहितायें, फिर भी विभागीय कर्मचारियों और सत्तारूढ़ लोगों पर पक्षपातीय आरोप, कार्य व्यवस्था पर, ऐसा क्यों ?
रिपोँट : डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”
■ जागो – जागो तुम श्रम सत्य नीति से नाता जोड़ो । पथ चुनों सत्कर्मो का ।
भारतीय संविधान नियम नीति विधान अंतर्गत भारत देश में भारतीय नागरिकों की सारी हितकारीय रूप स्वरूप से भारत के जनमानस की व्यक्तिगत जीवन की मानव समुदाय (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) की परेशानी पूर्ण समस्याओं के निराकरण हेतु भारत में संविधान निर्माण के बाद प्रजातंत्र की नींव भारत आजाद होने पर रखी गयी। जिसमें तरह तरह की हितकारीय योजनाएं बनाई गई ।
जीवन आवश्यकीय विषय अनुसार विभाग बने शिक्षा, स्वास्थ, कृषि, सुरक्षा, जमीन, मकान मानव समुदाय में पारस्परिक विवादास्पद स्थितियों के उत्पन्न होने पर निबटान हेतु न्याय प्रणाली, जीवन आवश्यकीय शरीर यात्रा के लिए परिवहनीय बस, रेल व हवाई यात्रा इन सबके संसाधन बनें।
सत्ता गठन चुनावी प्रक्रिया अन्तर्गत किया गया । हुआ और होता है। मानवजीवन विषयक अतिआवश्यकीय व आवश्यकीय स्थितियों के रूप स्वरूपों पर अच्छा व सही सत्य सुविधाओं की कल्पनाओं के शाश्वत् साकार रूप देने के लिए सत्तारूढ पार्टी द्वारा हर जीवन विषयक समस्याओं के निराकरण हेतु अच्छी व सही व्यवस्था संचालन के लिए अपने समुदाय से व्यक्ति निर्धारित किये ।
विभाग बनाये गये। जीवन की हर समस्यओं के सही व अच्छे निबटान के लिए तथा सभी विभागों के निबटान के लिए तथा सभी विभागों के अनुरूप देश व समाज के लोगों को सुव्यवस्था मिले,हो, बने व रहे। अच्छे विद्वानों के मतानुसार अच्छे रूप में सर्वहितीय स्तर से संज्ञान में लेते हुए लेखन व संकलन करके प्रत्येक जीवन संबंधी प्रत्येक विभाग के सत्य मानक दृष्टिकोण से जो भारत के जनमानस के सर्वहितों का, सर्वहितों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक विभाग संबन्धित विषय , व्यवस्था सम्हाल हेतु आचार संहिताओं का निर्माण हुआ।
उन्हें एक संविधान निर्मित स्वरूपीय दृष्टिकोण से एक आचार संहिता (पुस्तक ) रूप दिया गया। और सम्बन्धित विभागों को वह आवंटित कर दी गयी जो सभी विभागों के पास होती है, रहती है।
उनमें में वर्णित दिशा-दर्शन , नियम-नीति, सूत्र सिद्धांत को एक कार्य आचारीय स्वरूप प्रदान करके उनका परिपालन, संचालन विभागीय कार्य प्रणाली स्वरूप में उसी के अनुरूप विभाग का कर्मचारी, अधिकारी करता है और उसका ही सम्पूर्ण सत्य पालन करने का कर्तव्य व दायित्व सम्बन्धित विभागीय छोटे से लगाकर बड़े तक कर्मचारी व अधिकारी का सत्य पालन करने का सत्य उत्तरदायित्व है । उसी परिपालन के अन्तर्गत सारे विभागों को चलना चाहिए तथा सम्बन्धित मंत्री विभागों के लिए बनाये गये । जो भारत के जनमानस भारतीय समाज को , समाज के लोगों को संविधान नियम नीति अन्तर्गत सहयोगात्मक भूमिका आर्थिक व्यवस्थीय स्वरूप प्रदान करने में निभाते हैं।
विभागीय कर्मचारी व अधिकारी अर्थ आदि प्राप्ति उपरान्त जनहित्कारीय योजनाओं को प्रत्यक्ष शाश्वत् क्रियान्वन स्वरूप प्रदान कर नगर गली मुहल्लों का विकास निर्माण व जनसुविधायें प्रदत्त करते हैं सभी मानव जीवन सम्बन्धी सत्तारूढ़ सत्ता व आधिकारिक, कर्मचारिक व्यवस्था इन सभी समाज हितकारी, मानवहितकारी, देशहितकारीय इतने सूत्र सिद्धान्त से देश की समाज मानव के हित की योजना जनित व्यवस्थायें सम्पन्न होती हैं। जो देश हित, मानवहित संबन्धी होती हैं व कहलाती हैं।
वैसे उपरोक्त इतना स्तर सत्तारूढ़ राजतंत्र और संचालन हेतु शासकीय तंत्र अधिकारीय व कर्मचारीय तंत्र द्वारा संचालिनीय प्रक्रिया अन्तर्गत पर्याप्त है। परन्तु लोभ प्रलोभन लालसा के वशीभूत होकर सत्तारूढ़ राजतंत्र और कार्यरूप में परिणित होने हेतु अधिकारी व कर्मचारी भूमिका निभाता है।
तो विभागीय सर्वहित परक आचार संहिता में वर्णित सूत्र सिद्धान्त आचार ताक पर रखकर आस्था व सत्य निष्ठा आधार तंत्र , आचारतंत्र , भारत के संविधान की नियम नीति ताक पर रख कर आर्थिकोन्नति की लोभ लालसा के प्रलोभन तथा भोग वैभव ऐश्वर्यमयी जीवन सम्पूर्ण परिवार सहित की इच्छायें व्यक्ति में जन्म लेने कारण वह नैतिक आचरण व चरित्र को अनैतिक आचरण की ओर जाने को मानव प्रबल प्रवृत्त होने लगता है।
अतः समस्त परिवार सहित भोग , वैभव व ऐश्वर्यमयी जीवन बनाने के लिए व्यक्ति धनधान्य युक्त सम्पत्ति ही आवश्यक होती है। और वह , हम या हमारे भाई बन्धु ऊंची या छोटी शासकीय व्यवस्था में, शासकीय नौकरी में बैठे तथा राष्ट्रसत्ता बहुमतीय सत्ता में विद्यमान पूर्ण शक्ति व सामर्थ्य स्वरूप में एवं पूर्ण शक्ति सामर्थ्य से बैठे विद्यमान मानव बंधुजन अनैतिक आचार संहिता अपने तन मन इच्छाओं की भाव विचारों की धाराओं से मौखिकता से व गुप्त मौखिक संवादों के माध्यम से जीवन सम्बन्धी योजनाओं का पालक कोई भी विभाग हो सम्बन्धित मंत्री मिनिस्टर , मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री नैतिक पतन परक आचरण अपनाते हुए छल छद्म , झूठ फरेबीय स्वरूपीय, अन्याय जनित ,अत्याचारपूर्ण, भ्रष्ट्र आचरण अपनाते हुए।
मानवजन हितीय योजनाओं का धन विभिन्न – विभिन्न रूपों स्वरूपों के हतकण्डे अपनाकर सत्तारूढ़ लोग व शासकीय व्यवस्था संचालन में विद्यमान व्यक्ति देशकी जनता से विभिन्न- विभिन्न मदों से प्राप्त धन सम्पत्ति जो राष्ट्र सम्पत्ति देश के जन मानस की धरोहर के धन की बंदर बांट करने लगते हैं। और तभी ऐसा काफी समय से कहा जाता रहा है, कहा जाता है कि योजनाओं के प्रतिपादन हेतु अथवा सत्य संचालन हेतु 100 करोड़ ( सौ करोड़ ) की राशिआती है संसद व विधानसभाई घोषित निर्णीत स्वरूप से और चलते चलते आपस के बंदरबांट में सत्तारूढ़ मंत्री मिनिस्टर व शासकीय स्वरूपीय व्यवस्था के संचालनीय स्वरूप में बैठे अधिकारियों व कर्मचारियों के पारस्परिक वह धन “स्वमेव हड़पन् जयते” के माध्यम से 250000000 (पच्चीस करोड़ ) भी योजनाओं के कार्यान्वित स्वरूपों में लग जाये तो गनीमत है।
यह खेल राष्ट्र सत्ता , शासन सत्ता , व्यवस्थीय सत्ता तथा सामाजिक सत्ता के भी कुछ लोग तामसीय व राजसीय प्रकृति प्रवृति के लोग भी इस धन सम्पत्ति की बंदर बांट में धन सम्पत्ति की प्राप्ति हो ,तो लोभ लालसा के वशीभूत होकर ऐजेन्टीय भूमिका निभाते हैं और वे भी शामिल हो जाते हैं। दर्शाया यह जाता है कि मैंने सामाजकीय स्वरूप प्रजाजनों को भी इन सारी योजनाओं की क्रियान्वनीय स्वरूप में शामिल किया । अपने पारदर्शीय स्वरूप को बताने के लिए, दिखाने के लिए , प्रजाजनों को समझाने के लिए इस देश के सत्तारूढ़ जन , शासन सत्ता जन , शासकीय व्यवस्थायी जन और सामाजिक प्रतिष्ठावान जन इसका प्रतीक है ? कि इनके पास अरबों खरबों की धनसम्पत्ति वैभवपूर्ण साम्राज्य व बड़े-बड़े महल अटारी अट्टालिकायें प्रत्यक्ष और गुप्त स्वरूप में प्रत्यक्ष व शास्वत स्वरूप में दृष्टिगोचर हैं। इसलिये जो प्रत्येक विभागीय नियमनीति, आचार , आचार संहितायें, संवैधानिक व्यवस्था स्वरूपीय नियमनीति ताक पर रखते हुए सरकारें, सरकारों में विद्यमान व्यक्ति तथा शासनसत्ता व्यवस्था में बैठे शासकीय अधिकारी , शासकीप कर्मचारी सब संबैधानिक आचारसंहिताओं की धज्जियां उड़ाकर यथार्थ व पूर्ण परम सत्य नीतियों को धता बताकर अपने मन मानीय भाव विचारीय रूप स्वरूप आचार अपनाते हैं, अपना रहे हैं।
और वे संवैधानिक स्वरूपीय आचार संहितायें व्यक्ति के व्यक्तिगत आचार चरित्र व भ्रष्ट्र आचरणीय स्वरूप के आगे बौनी व निष्क्रिय हो गई हैं , होती जा रही हैं और हो रही हैं। जिसके दुष्परिणाम भारतका जन मानस विभिन्न विभिन्न कष्ट, दुःख संताप परेशानियों के रूप में झेल रहा है। कहीं कोई किसी भी रूपकी कोई पूर्ण परमसत्य स्थिरता नहीं है ।
समाज न्याय मांगने जाता है सत्य कर्तव्य दायित्व से न्याय नहीं मिलता, न्याय नहीं दिया जाता। वर्षों से बीसों सालों से लाखों मामले लंबित हैं। जो अव्यवस्था सत्य कर्तव्य दायित्व , निर्वहन हीनता का प्रतीक है। शिक्षा, स्वास्थ ,खेती, किसानी , कार्यव्यापार, रोजगार , नौकरी सारे के सारे अस्थिर व अव्यवस्थित, शंका संदेहों की गिरफ्त से घिरे हुए हैं। देश का गरीब तबका कार्य, व्यापर, रोजगार, पूंजी अभाव से तृस्त है शासन सत्ता द्वारा थोड़ा सा खाद्य राशन पानी बांटना भारत के जन मानस को काहिल , जाहिल , हरामखोर , मक्कार अकर्मण्य बनाना और जनमानस मुफ्तखोरी में पड़ जाने कारण व्यवसनों में डूबे रहना ये उनके जीवन कार्य प्रणाली की नियति बन गयी है। परमेश्वरीय प्रकृतेश्वरी ने शरीर दिया जीवन दिया हाथ पैर दिये , बुद्धिविवेक दिया कठोर मेहनत करने के लिए, सत्य मेहनत श्रम से आत्म निर्भर होने बनने स्व उत्थान व निर्माण करने के लिए। वह सब सत्ता आसीन प्रलोभन कारण।
सब सत्य यथार्थ सत्व गुणीय सात्विकीय प्रकृतीय । जो ईश्वरीय परमसत्ता सर्वोच्च सत्ता नियमनीति का पूर्ण परम सत्य , पूर्णसत्य विकास व सत्य सुख आनंद शान्ति प्रदायक है।
मानवजीवनान्त तक पूर्ण परमसत्य आत्मसंतोष परक व आत्म संतुष्टि प्रदायक है। वह सारे असत्य वादियों, अन्यायी अत्याचारियों की बहुसंख्यीय वृद्धि विश्वसत्ता , राष्ट्रसत्ता पर होने रहने विस्थापित स्वरूप से सब सत्य नियमनीति जो सर्व कल्याणीय सर्वहितीय सर्वमंगलमयी है वह अनाचारियों, दुराचारियों , की संगठिटता कारण उनका सर्व वर्चस्व होने कारण सब योजनाओं का सत्यस्वरूप ध्वस्त है। जीवन संचालन सम्बन्धी प्रत्येक विभागीय अपनी अलग अलग बनी रखी संवैधानिक सत्य आचार संहितायें आज अन्याय अत्याचार , छल छद्म , झूठ, पाखण्ड , धोखा दगा के बोलबाला कारण सब प्रभाव हीन हैं। व कर दी गयी हैं। नैतिक पतन परक नीति नियम विधान की विध्वंसता के कारण मनमानी नीति मनमाना विधान जो पूर्णतया असत्य परक है। भारत देश उसकी गिरफ्त में है तथा तहसनहस स्थिति में चल रहा है , आ गया है। आज भारत देश केजनमानस का हृदय जो सर्वहितीय विचारशील है । व्यथित व दुःखी है।
धन सम्पत्ति शारीरिक मानसिक इन्द्रिय जनित सुखदायी हो सकती है। परन्तु तनमन जीवन सत्य मनोभाव सुखदायी कभी भी नहीं हो सकती है। उसके लिए सत्यआचार , सर्वहितीय आत्मवत् सर्व सृष्टि , सृष्टिके सर्वदेश और हमारा भारत देश का प्रत्येक जनजन पास्परिक आत्मवत् आत्मीयता परदुःखकातरता , परदुःख अनुभूति स्वयं पारस्परिक रूप से अनुभवकर्ता व ” आत्मवत् सर्वभूतेषु “ का आत्मसात् प्रत्येक व्यक्तिको चाहे वह राजतंत्र में हो या शासन सत्ता तंत्र में या शासकीय व्यवस्था तंत्र में सबको आत्मसात् करना होगा ।
परमेश्वरीय सत्यस्वरूप को प्रत्येक मानवशरीर को हृदयंगम करना होगा तभी राष्ट्रजन, राष्ट्रसत्ता , व्यवस्थीय शासन सत्ता और प्रजा जनीय सत्ता सत्य व पूर्णसत्य सुखी व आनन्द मयी धारा में बहने की अनुभूति कर पायेगी। । . सत्य न्याय निति की धारा सर्वत्र प्रत्येक तन मन में जन जन में, प्रत्येक हृदय में बह पायेगी ।
आओ मेरे परम सत्य आत्मिक बंधुओ जो ईश्वरीय प्रकृतीय और आत्मीय , आत्मवतीय सत्य है उसे सत्य से जाने , ध्यान से पहिचाने और सत्य से जाने और सत्य से जीवन कर्म चरित्र में धारण करें व अपनायें । स्वयं सुख पाये। सर्व सुख पायें व देश राष्ट व विश्व को सत्य नीति पर चलकर सुखशान्ति मय , आनन्दमय, सर्वखुशी व प्रसन्नतामय बनाए । यह सब हम सभी लोगों के हाथ में है । “आत्मवत् सर्वभूतेषु “ सर्वदुःख आत्मदुःख सर्वसुख आत्मसुख । “वसुधैव कुटुम्बकम् “ की भावविचारी धारा को सत्य रूप में अपने मनो मस्तिष्क हृदयी भावविचार धारा में स्थान दें। भारत राष्ट्र उज्जवल होगा भारत का प्रत्येक मानव उज्जवल होगा।
विश्व व विश्व के देश उज्जवल होंगे। विश्व में सुख शान्ति आनंद की बयार प्रत्येक हृदय में बहेगी । आओ हम सब मिलकर ऐसा सत्याचार बनाऐं । ऐसा सत्याचार अपनाएं। ऐसा सत्याचार चलाएं। जहाँ दुःख नाम का कोई स्वरूप न हो मात्र खुशी ही खुशी प्रत्येक हृदय में सृष्टि में व्याप्त हो । विश्व में व्याप्त हो । विश्व के देशों में व्याप्त हो । भारत देश में व्याप्त हो ।
तुम हो धरती के पुत्र न हिम्मत हारो श्रम की पूंजी से अपना कार्य संवारो ।
श्रम की सीपी व सत्य नीती में ही वैभव ढलता है। तब स्वाभिमान का द्वीप स्वयं जलता है ।
जागो – जागो तुम श्रम सत्य नीति से नाता जोड़ो । पथ चुनों सत्कर्मो का ।
छल छद्म झूठ व असत्य को छोड़ो । सारा जीवन सत्य से ही सम्हलता है।
दैव कृपा ऐसे ही मानव पर सत्य रूप में फलता है।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”






