जो पूर्ण निःस्वार्थी , निष्कामी , निष्कपट , सभी व्यवसनों से रहित , कहीं किसी भी स्वयं या परिवार के लोभ लाभ की इच्छा आकांक्षाओं से पूर्णतया दूर , सम्पूर्ण भेदभावों से निर्मूल , पूर्ण उदार , दयालुतामयी हृदय, परमपिता परमात्मा के सत्य नियमों में न्याय में पूर्ण विश्वास करने व रखने तथा पालन धारण करने वाला । संसार समाज के सम्पूर्ण जीव प्राणी मानवों को आत्मवत् मानते व जानते हुए , अपने शरीर से यथोचित आत्मशक्ति सामर्थ्यानुसार हर समय हर जगह दुःखी पीड़ित, गरीब, दीनहीन , निर्बल दुर्बल, असहाय लोगों की सत्य सेवा में सदैव तत्पर रहना /होना । आत्मत्यागी । वक्त परिस्थितियों में घिरे सक्षम लोगों की भी यथोचित मदद , सहयोग , सेवा में भी बगैर कहीं कोई भेदभाव किये , तत्पर रहना ही । सत्व व पूर्ण समाजसेवी की सत्य व्याख्या है। उसमें अंशमात्र भी किसी भी तरह की अपने निजसुख स्वार्थ सिद्ध करने की अंशमात्र भी भावना नहीं होना चाहिए।
– डाo बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”


