करके देख लो ईश्वरीय सत्य का आचार यही है , विश्व में मानव-मानव में शान्ति का मात्र मूल आधार यही है
■ आत्मा का सत्य हृदय से स्वीकार कर। सृष्टिविश्व का स्तर सम्हल जायेगा।।
डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”
सत्य का हम बहुत बध कर चुके, बहुत विरोध कर चुके हैं और आदिकाल से आजतक करते चले आरहे हैं ।
आओ हम सभी लोग सम्हले, सुधरें और अपनी नीतियां मनो सोचीय धारायें बदलें तथा विश्वशान्ति राष्ट्रशान्ति और आत्मशान्ति का उद् घोष करें।
हम सभी कूटनीति, कुटिलनीति, कपटनीति से खून खराबा बहुत कर चुके । इस खून खराबे में कितनी माताओं के लाल गये, बहिनों के भाई और भार्याओं के सुहाग , बेटे-बेटियों के संरक्षक , रक्षक , पालनकर्ता, भविष्य निर्माता, पिता स्वरूप देव गये और इस कुटिलपूर्ण अहंकारी नीति में मानव विनाश विश्व का , राष्ट्रों का, राज्यों का,समाज का, घर परिवार का हुआ है व हो रहा है।
ईश्वरीय दृष्टि दर्शन से यह अपने ही आत्मिक भाइयों का वध इनकुटिल नीतियों कारण विश्व को ,राष्ट्रों को, राज्यों को अति पाप आचारी बोझ से अति बोझिल निरंतर करता चला आ रहा है।
सम्हले इस प्रक्रिया से , सम्हले इस अति पाप अन्यायी , अत्याचारी रूप से अन्यथा परमेश्वरीय सत्ता के सत्य न्यायनीति से कोई बचने वाला नहीं है।
उसका दण्डीय खेल इस तरह का होता है कि कल्पना तक जिन रूपों की , जिन रंगों की कभी सोची न होगी, वही हम सभी के दण्ड के कारक होंगे।
वह हजारों आखों से, सूर्य की प्रकाशीय किरणों से , वायु के झरोखों से तुम्हारी हमारी प्रत्येक गतिविधि हर पल, हर समय देख रहा है । उससे बचना नामुमकिन है ।
सुनते आये हैं कि उसकी मार में आवाज भी नहीं होती और वह थपेड़ों से प्रहार करता रहता है अथवा दण्ड देता रहता है। हम सभी तड़पते , सिसकते , हतप्रभ होते हुए रोते रह जाते हैं ।
हमारे द्वारा कुटिल कपटपूर्ण नीति से अनीतिपरक इकट्ठा किया गया साम्राज्य , वैभव ,ऐश्वर्य और धन सम्पत्ति का उपभोग करना ही हम भूल जाते हैं । कुछ ऐसी वीभत्स घटनायें हो जाती हैं , जैसे इकलौता बालक, वंशचालक युवावस्था में चला जाये। जिसके लिए ही हम सभी ने छल छद्म, झूठ पाखण्ड, अन्याय-अत्याचार करके, हत्यायें करवाके एवं करके जो विशाल वैभवपूर्ण साम्राज्य बनाया और वहीं नहीं रहा तो मन हृदय गृहस्वामी गृहस्वामिनी अर्थात् हम माता पिताओं का हृदय जीवन पर्यन्त विषाद में दुःख में, हार्दिक कलेश में, मनोमस्तिष्कीय दुःख कष्टों में ही व्यथित रहेगा। फिर वह वैभवपूर्ण साम्राज्य कौन भोगेगा ?
इसी विचार में हम सभी ऐसे लोग टूटते, डूबते , उतराते , सोचते, विचारते आयु क्षीण करते हुए दुर्बल निर्बल स्वरूपों से मृत्यु की कगार पर पहुंच जायेंगे अथवा पहुंच जाते हैं।
इसलिए क्रोध, वकुटिल नीति की, कपटनीति की अन्यायी , अत्याचारीय , अहंकारीय प्रेरित राजनीति । सुखदायी, शान्तिदायी और आनंददायी नहीं है।
विचार करें घरमें, पास में ,पड़ोस में, गली मुहल्ले में, नगर, राज्य, राष्ट्र, विश्व में, विश्व के देशों में विषमता का बीज न बोयें और खून की होली, जनजीवन हानि की होली, माताओं बहिनों , बेटियों के सुहाग उजाड़ने की होली पारस्परिक देशों में युद्ध छेड़कर सैनिकों की जीवन हानि के रूप में न खेलें अथवा खेलना बंद करें।
” आत्मवत् सर्वभूतेषु “ हम सब में हैं और सब हम में हैं । “वसुधैव कुटुम्बकम् ” अर्थात् वसुधा सृष्टि के धरातल पर जितने भी मानव जीव प्राणी हैं सब हमारे ही अपने हैं और हम सब उनके हैं। यह सूत्र और सिद्धान्त खाली लिखने,देखने, पढ़ने , सोचने के लिए नहीं है । प्रत्येक मानव को हृदयंगम करने, आत्मसात् करने के लिए एवं उसे जीवन संचालन क्रिया प्रक्रिया में, सम्पूर्णतया पारस्परिक रूप से आत्मीयता, मानवीयता , मानवता के निर्वहन हेतु मन मस्तिष्कीय बुद्धि विवेक में लाने अपनाने सभी जनों द्वारा एक दूसरे के प्रति अपनापन सत्य रूप में बरसाने के लिए है ।
जगत पिता परमेश्वरीय सत्ता तभी हमसभी सृष्टिमानवों से हम सभी के पारस्परिक प्रेमीयआधार स्वरूप को देखेगा तो वह भी अपनी ओर से हम सभी के लिए सुख शान्ति , आनंद स्वरूप को बरसायेगा।
बरकत की दौलत सृष्टि जगतको मानवजगत को धनधान्य सुख समृद्धि से मालामाल करेगा । राष्ट्रों में विश्व के देशों में सुखशान्ति आनंद की बयार प्रत्येक घर घर में, प्रत्येक मानव हृदय में बहेगी । सब विश्ववासियों के हृदय में प्रेम की गंगा बहेगी।
” ना होगा कोई भूखा प्यासा , ना होगा कोई खून खराबा । पूरण होगी सबकी आशा , ऐसे होंगे सब देशों के राजा । । ” यह होगा ईश्वर सृष्टि के सत्य राजराजा की , बादशाह की, शहंशाह की, सत्ताधीश की सही सत्य ईश्वरेच्छीय सत्य राज्य व्यवस्था ।
जहाँ दुःख कष्ट जीवन हानि का कहीं कोई मंजर नहीं होगा । जो आज विश्व में त्राहि-त्राहि मची हुई है वह समाप्त होकर पारस्परिक स्वरूप में देशों में आत्मिक प्रगाढ़ता होगी । प्रेम की प्रगाढ़ता होगी। विनाश की उठने वाली विश्व की विभिषिकायें शान्त हो जायेंगी और ईश्वरीय सत्य का सत्य राज्य सृष्टि में (विश्व में) विस्थापित होगा। लोग पूरी आयु पायेंगे अपने बाल गोपालों के साथ अपने मातापिताओं के साथ , अपने इष्ट मित्रों नाते रिश्तेदारों के साथ गले मिल मिलकर जश्न मनायेंगे । सृष्टिपटल में विश्व पटल में खुशियों की बरसात होगी / रहेगी सभी विश्ववासी गले मिल मिलकर नाचेंगे झूमेंगे परमात्मा का दिया शरीर का सही उपयोग करेंगे व सत्य जीवन जियेंगे।
“छोड़ दे छल दम्भ को, झूठ पाखण्ड और घमण्ड को ।
मानव-मानव आपस में प्यार कर
आत्मा का सत्य हृदय से स्वीकार कर
सृष्टिविश्व का स्तर सम्हल जायेगा
परमेश्वर का प्यार हे मानव तू सत्य रूप में पा जायेगा ।
मानव-मानव में पारस्परिक प्रेम का आधार यही है ।
करके देख लो ईश्वरीय सत्य का आचार यही है , विश्व में मानव-मानव में शान्ति का मात्र मूल आधार यही है ।। “
-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





