वैवाहिक स्वरूप का पूर्ण परम सत्य, सुख, शान्ति , आनंद यदि लेना चाहते हो तो ? सत्य भार्या, सहधर्मिणी, सहसंगिनी का स्वरूप सत्य आचारीय सम्पूर्ण पूर्ण परमसत्य समर्पणीय जीवन अपने भर्तार , अपने स्वामी, अपने पति के प्रति सम्पूर्णतया होना व रहना चाहिए । तथा दोनों को पारस्परिक स्नेह, प्रेम पूर्ण परम सत्य रूप में निर्वहन की भाव विचारधारा सदैव हर पल, हर क्षण ताजीवन मनोभावीय होना व रहना चाहिए। एक दूसरे का दुःख दर्द दोनों में सदैव बांटने का मनोभाव होना व रहना चाहिए। यही दाम्पत्यीय जीवन के सत्य सुख शान्ति के आनंद मयी जीवन जीने के मूल श्रोत हैं। इसी पर ही पूर्ण परम सत्य तत्त वेत्ता , तत्ववेत्ता महामानव, सन्त कायावीर (कबीर ) का एक सत्य दृष्टान्त है। श्री कबीर जी दिन में प्रवचन कर रहे थे । तभी एक व्यक्ति आया और श्री कबीर जी से प्रश्न किया कि महाराज जी मनुष्य को विवाह करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ? प्रश्नकर्ता को श्री कबीर जी ने सभी प्रवचन सुनने वाले लोगों के बीच में बैठने का संकेत दिया और प्रश्नकर्ता बैठ गया। उनके प्रवचन करते समय दिन का समय था धूप का प्रकाश फैला हुआ था । श्री कबीर जी ने अपनी भार्या ( सहधर्मिणी ) जिनका नाम लोई था को आवाज दी अरे प्रिये देखो अंधेरा हो गया है दीपक जलाकर रख जाओ उनकी सहधर्मिणी श्री लोई जी पूर्ण शान्त व चुप रहते हुए आयीं व जलता हुआ दीपक रख गयी और चली गयीं। प्रवचन समाप्त हुए। प्रश्नकर्ता ने पुनः पूछा महाराज जी मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला श्री कबीर जी बोले, अरे भाई उत्तर तो प्रवचन करते समय ही दे दिया गया। फिर सुनलो और समझ लो। प्रवचन करते समय भरपूर धूप थी व प्रकाश था। मैंने अपनी सहधर्मिणी को आदेश दिया कि अंधकार हो गया है दीपक जलाकर रख जाओ। वे पूर्ण शान्त व चुप रहती हुई दीपक रख गयीं उन्होंने मुझसे प्रकाश और अंधेरे का कोई जिक्र नहीं किया। बस इस तरह की सहधर्मिणी , भार्या, पत्नी मिले तो अवश्य ही विवाह करना चाहिए। क्योंकि दाम्पत्य जीवन पारस्परिक सुख शान्ति आनंदमयी जीवन मिले व बिताने का पूर्ण परम सत्य यही वैवाहिक स्वरूप है और यही वैवाहिक स्वरूप के सत्य आनंद का सत्य अभिप्राय है व यही परम सत्य तात्पर्य है। तो यह है हे भ्रातृ आपके प्रश्न का उत्तर । और दोनों (पति-पत्नी ) का जीवन सदैव क्लेशमय हो हर पल, हर क्षण कलह का वातावरण बना रहे तथा दोनो का हृदय , मन, मस्तिष्क सदैव अशान्त रहे ऐसे गुण स्वभाव वाली धर्म पत्नी बने या मिले तो तुम खुद ही समझ सकते हो ऐसी स्थितियों में विवाह करना उचित है या अनुचित । अथवा विवाह करना चाहिए या नहीं करना चाहिए । ।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





