कौन हैं सुतीक्ष्ण दास महाराज, जिनके चरणों में बैठकर प्रेमानंद महाराज ने की आत्मीय बातचीत? वृंदावन का उदात्त संत परंपरा का गौरव
मथुरा/वृंदावन। केलिकुंज आश्रम में शनिवार का दिन आध्यात्मिक सौहार्द और सम्मान की मिसाल बन गया। हमेशा साधु-संतों की उपस्थिति से गुलजार रहने वाले इस पवित्र स्थल पर जब वृंदावन के प्रतिष्ठित संत सुतीक्ष्ण दास महाराज पहुंचे, तो दृश्य ऐसा था जिसने सभी शिष्यों के मन में विनम्रता का अद्भुत भाव भर दिया।
सुतीक्ष्ण दास महाराज को देखते ही संत प्रेमानंद महाराज अपने आसन से तत्काल खड़े हो गए। उन्होंने आगे बढ़कर उनके चरण स्पर्श किए। शिष्यों ने सुतीक्ष्ण दास महाराज के लिए कुर्सी लगाई, लेकिन प्रेमानंद महाराज स्वयं ज़मीन पर उनके चरणों में बैठ गए।
सुतीक्ष्ण दास महाराज ने विनम्रता से टोकते हुए कहा—
“ऐसा संभव नहीं है।”
परंतु प्रेमानंद महाराज ने आग्रहपूर्वक उत्तर दिया—
“मुझे आपके चरणों में बैठना ही अच्छा लगता है।”
आध्यात्मिक परंपरा में यह दृश्य संत–महात्माओं के बीच आदर, आत्मीयता और समभाव का दुर्लभ उदाहरण बन गया।
“भजन तब तक पूंजी नहीं जब तक महापुरुषों का आशीर्वाद न मिले” — सुतीक्ष्ण दास महाराज
सम्मान समारोह में शिष्यों ने सुतीक्ष्ण दास महाराज को पीतवस्त्र और शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया। इसके पश्चात उन्होंने भक्ति मार्ग की महत्ता पर गहन विचार प्रस्तुत किए।
उन्होंने कहा—
> “हमारे भजन पूंजी नहीं होते, जब तक महापुरुषों का आशीर्वाद न मिले।
महापुरुष ही ठाकुरजी की गोद में बैठा देते हैं।
संसार में स्वार्थ के बिना आपके पास कौन आता है—
पर महापुरुष इस नियम से परे हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि इस दुनिया में
“बिना स्वार्थ कोई भगवान को अगरबत्ती तक नहीं दिखाता।”
“भगवान में करुणा है, इसलिए वे भक्त के स्वार्थ को भी भक्ति मान लेते हैं”
आगे वे बोले—
> “अगर जीव में दोष देखने लगे ठाकुरजी, तो किसी का कल्याण ही न हो सके।
संत और महापुरुष भी अगर दोष देखने लगें, तो मानवता का उद्धार नहीं हो पाए।
चाहे कोई सीधे पड़े या उल्टा पड़े—भगवान के समक्ष आए, उसका कल्याण निश्चित है।”
सुतीक्ष्ण दास महाराज ने निस्वार्थ भक्ति पर जोर देते हुए कहा कि ठाकुरजी की करुणा इतनी असीम है कि वह स्वार्थ से की गई पूजा को भी
“कम से कम किसी बहाने से सही, हमारे चरणों में आया,”
कहकर स्वीकार कर लेते हैं।
वृंदावन के सम्मानित संत: कौन हैं सुतीक्ष्ण दास महाराज?
सुतीक्ष्ण दास महाराज वृंदावन की प्रसिद्ध ‘सुदामा कुटी’ से जुड़े संत हैं।
वे सनातन धर्म के प्रति निष्ठा,
संत परंपरा के प्रति सम्मान,
और भक्ति मार्ग की सहज व्याख्या
के लिए जाने जाते हैं।
मथुरा—वृंदावन क्षेत्र में उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। वे नियमित रूप से प्रवचन, कथावाचन और धार्मिक आयोजनों में सम्मिलित होते हैं। संतों के बीच सद्भाव, एकता, और भक्ति-प्रेम को बढ़ावा देना उनकी पहचान है।
उनकी और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात को भक्त एक आध्यात्मिक संगम की तरह देख रहे हैं।



