हे मेरे प्यारे आत्मिक भाइयों, माताओं, बहिनों , बेटियों ,  गृहलक्ष्मियों पाप आचार अपनाकर , कुकर्मों की फांश में बांधकर एक दूसरे को अपने ही आत्मिक आत्मा अंशी निज जनों के साथ सृष्टि के धरातल पर जो भी जीव , प्राणी , मानव ( नर – नारी , स्त्री-पुरुष ) पशु , पक्षी, दृष्टिगोचर हैं । वह सब रामायणानुसार, भगवद् गीतानुसार से वेदपुराणोंनुसार, सद्ग्रन्थों सत्यतत्त वेत्तीय ज्ञान धारियों, विद्वानों के अनुसार सभी जीव , प्राणी , मानव, पशु पक्षी सभी आत्माई आत्मिक आत्मवत् बंधु भ्रातृ स्वरूप हैं । फिर सोचो हम किसी भी अन्य को दूसरे को गैर मानकर उसे लूटने, ठगने , छलने उसके साथ झूठ फरेब करने उसे धोखा दगा देकर उसके साथ विश्वासघात करने में चूकते क्यों नहीं ? किसी भी अन्य के साथ अन्याय अत्याचार करने से डरते क्यों नहीं? सोचो? पाप आचार अपनाकर पुण्य आचार तीर्थ, मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा व प्रवचन कर्ताओं कथा , भागवद् , कुरान , बाइबिल , गुरुग्रन्थ साहिब का पाठ आदि अपने द्वारा किये गये कुकर्मी पाप आचारों से दोष मुक्त होने के लिए पुण्य सलिला सरिताओं का उनमें स्नान करने वृत, उपवास , जप तप साधना , आराधना का आश्रय ढूंढ़ते फिरते हो करते फिरते हो, लेते फिरते हो। इनसे पाप आचारी कर्मों से परमेश्वरीय सत्ता के नियम नीति विधान अन्तर्गत मुक्ति मिलने वाली है नहीं। अरे प्यारे आत्मिक बंधुओं पाप रूपीप कुकर्मीय कर्म आचार अपनाकर उसका उपचार ढूंढना, व्यक्ति की बुद्धिमत्ता नहीं है। अरे भैया ये सब कर रहे झूठ फरेब , धोखा, दगा, लूट, खसोट, विश्वासघात , अन्याय अत्याचार धन सुख वैभव की ऐश्वर्य की लालसा पालकर उसकी पूर्ति करने के लिए पाप आचार अपना रहे। इस शरीर का किसी भी  क्षण पता नहीं कहाँ कब किस  क्षण किस समय ,काल (मृत्यु ) का ग्रास बन जाये। फिर मरने उपरांत साथ कुछभी एक सुई भी नहीं जाती है। संतानों का कोई पूर्ण परम सत्य भरोसा,विश्वास जरूरी नहीं है कि वे तुम्हारे शरीर टूटने, क्षीण होने, खाट पकड़ने पर तुम्हारी पूर्ण परम सत्य देखभाल सेवा सुश्रूसा ही पूर्ण सत्य रूप में करें । फिर पापाचारीय आचार कार्य व्यवहार कार्य व्यापार करने से क्या लाभ ? क्या फायदा। महाराजा भृतृहरि का अनुभवीय कथन है । कि उनकी पत्नी ने उनके साथ धोखा विश्वासघात किया था जिससे वे तन मन से राजसीय ऐश्वर्य , भोग , वैभव त्यागकर परम सत्य आचारीय स्वरूप की ओर उन्मुख हो गये थे। उनका कहना है कि पाप आचार अपनाकर जप तप तीर्थ मन्दिर या अन्य आस्था स्थल जाने व पूजा पाठ करने तथा पुण्यमयी सलिलाओं में स्नान करने के लिए दौड़ने व पापों से अपने द्वारा किये गये कुकर्मों से बचने के लिए उपरोक्त साधन अपनाने से श्रेष्ठ है। स्वयं के द्वारा पालनीय सत्वगुणीय आचार, सात्विकीय प्रकृति स्वरूपीय कार्यव्यवहार में तन मन जीवन इंद्रियों की इच्छा पूर्ति कार्य व्यापार में उपरोक्त सत्वगुण सात्विकीय प्रकृति जिसमें छल छद्म , झूठ, पाखण्ड , धोखा, दगा, विश्वासघात , अन्याय, अत्याचार किसी के साथ भी न करें क्योंकि सारी संरचना सारा सृजन उस परम सत्ता , सर्वोच्च सत्ता , प्रकृतेश्वरी सत्ता परमेश्वरीय सत्ता का ही खेल है। वह अपने कण- कण में व्याप्त प्रकृति सत्ता स्वरूप पूर्ण सूर्य स्वरूप ज्योति प्रकाश किरणों के माध्यम से पृथ्वी तत्व में विद्यमान वृक्ष , पौधे, वनस्पतियां, वायुतत्व जो हर जगह सूनसान में, बियाबान में घर मकान में समीर स्वरूप में बह रहा है , जल तत्व स्वरूप में प्रवाहित है। विशाल आकाशीय तत्व से जो सृष्टि के समस्त धरातल को घेरे हुए हैं। इन ऐसी अपनी सत्य व्यवस्था से वह सब प्रत्येक  क्रिया विधि , कर्म विधि , सुकर्म, कुकर्म विधि जो सात पाताल के भीतर भी किये जायें , उससे व्यक्ति के अपने कोई भी काम छुपाये नहीं जा सकते हैं। और आचार ( कर्म )के कुकर्मी तो ना पुण्यमयी सलिला (नदी), तीर्थ , जप, तप, साधना , आराधना , कथा, भागवद् वेद पुराणों का पाठ, कुरान पाठ बाईबिल पाठ, गुरुग्रन्थ साहिब पाठ व उपनिषदों के वाक्यों के प्रवचन के माध्यम से सुनने पर कहीं कोई गलत , असत्य, झूँठ, फरेबीय कार्यों के पापों से मुक्ति मिलने वाली है नहीं । इस परम सत्य को परमात्मीय परम पिता जगतपिता जगतमाता के सत्यको चतुराइयों ,चालाकियों , विद्वताओं के स्वरूपों से झुटलाया नहीं जा सकता है । किये पापाचारीय कुकर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा ।

“कर्म प्रधान विश्व रचिराखा । जो जस करई तो तस फल चाखा ।। ” “कोऊ न काहू को सुख, दुःख व उद्धार करन का दाता । । “

“राम न मारे काहू है दोषी नहिं है राम , आप ही से मरि जात हैं करि करि खोटे काम ॥ ” 

रोम- रोम में रमने वाली परमेश्वरीय सत्ता किसी को नहीं मारती । व्यक्ति के गलत असत्य खोटे कुकर्मीय कार्य ही उसे मार डालते हैं।

“राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेय । जाकी जैसी चाकरी ताको तैसा देय । “

इसलिए सत्य आचार अपनाने वाले सदैव सुखी रहते हैं और आत्म शांति स्वरूप को चमत्कारीय रूप से जीते हैं। उन्हे कभी भी कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता । झूठ, फरेब , धोखा, दगा, विश्वासघात को अपनाने वाले सदैव संकटमयी व्याधियों से घिरे रहते हैं। क्योंकि कुकर्मीय भांडा कब फूट जाये और कष्टों का दुःखों का आगम शुरू हो जाये।

“संगत कीजे सत्य आचार की जीवन में मिलेगा आनंद का सत्य चमत्कार । संगत कीजे झूठ फरेब की हर समय घेरे रहेगा दुःखों का आचार । तो सत्याचार का यही है सत्य चमत्कार ॥”

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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