परमपिता परममाता सर्वेश्वर / सर्वेश्वरी से उनकी जीव प्राणी मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) की उनसे सत्य प्रियता सत्य प्रेम उनकी सत्य साधना , आराधना सत्य पूजा – पाठ की उपरोक्त धर्म स्थलों पर जाने से पूर्व व्यक्ति के पास निम्न गुणों का होना, निम्न वर्णित गुणों का आचार धारण किये बिना । उपरोक्त धर्म स्थल मंदिर , मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा अथवा कथा भागवद् व ईश्वरीय संबन्धी प्रवचन सुनना सुनाना सब पूर्णतया व्यर्थ व निरर्थक है । सत्य मायने में ईश्वरीय सत् सत्व गुण व सात्विकीय प्रकृति, प्रवृत्ति यदि व्यक्ति (स्त्री पुरुषों , नरनारियों ) में जीवन संचालन में जीवन कार्य व्यापार , खानपान, भोजन आहार , कार्य व्यवहार, भोग , सम भोग, मैथुन आदि में आत्म संयम , अपने तन मन जीवन पर अपनी जिव्हा , इन्द्रियों की गतिविधियों पर आत्मनियंत्रण पंचविकारों की (काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार ) आसक्तियों पर सम्पूर्ण विजय अर्थात् सम्पूर्ण परमसत्य आत्म नियंत्रण । किसी भी अन्य दूसरे शरीर, आत्मीयजन,भ्रातृ स्वरूप , मातृ स्वरूप पर कहीं कोई छल ,छद्म , झूठ ,पाखण्ड, धोखा , दगा , अन्याय अत्याचार नहीं । ऐसा मनोभाव , ऐसी मनोसोच , ऐसी मनोप्रवृत्ति व्यक्ति की होना चाहिए , व्यक्ति में रहना व चलना चाहिए । परमात्मा परम ईश्वर सर्वोच्च सत्ता प्रकृतेश्वरी मातृ सत्ता स्वरूपा को यही आचार उसे रिझाने का ,मनाने का , उससे प्रेम नाता जोड़ने जुड़ाने का यही पूर्ण परमसत्य सत्वगुणीय व सात्विकीय प्रकृति प्रवृत्ति और पूर्ण परमेश्वर के सत्य नियम नीति का नियम विधान व सत्य आचार है। यदि व्यक्ति (नरनारी , स्त्रीपुरुष) इसके विपरीत काम करता है। तो ईश्वर को परम आत्मा को धोखा देना और उसकी आंखों में धूल झोंकना जैसा मात्र है। ऐसे छली छद्मियों को कालेमन और बाहर उजला तन जैसा रूप है अर्थात्  “मुख में राम बगल में छुरी ।। “ ऐसे रूप रंगों से परमसत्ता , परमपिता , परममाता , जगद् ईश्वर , जगद् सृजनहारा , पालनहारा , संहारणहारा , सर्वबुद्धिदाता, सर्वज्ञानप्रकाश विवेक दाता को रिझाया और मनाया नहीं जा सकता है।  ” मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा जाने से पहिले ? यदि सत्य आचरण सत् चरित्र तुमने नहीं संवारा तो परमात्म सत्ता से तुम बहुत दूर , प्रकृतेश्वर से मिलेगा नहीं तुम्हे सहारा । क्योंकि सत्य सत्येश्वर सत्य को चाहने वाला है । उसने सत्यवान सत्य आचरणीय धनियों को सत्य रूप से संवारा है । जिसने सत्य आचरण अपना बनाया , ईश्वरीय नियम नीति के सत्य से अपने को तपाया , उसने ही परम सत्ता जगद ईश्वर प्रकृति सत्ता के गोद में स्थान पाया , उस पर ही रहा परमेश्वर का वरद् हस्त, वही पूर्ण परम सत्य रूप में भव सागर से मुक्त हो पाया । ।

और भी सत्य आचार – ‘ जैसा अन्न वैसा मन ‘  गलत तरीकों की अनैतिक कमाई अथवा भ्रस्ट आचार से कमाई गई दौलत से आया अन्न या कोई वस्तु भोजन , आहार और अपने तन , मन , जीवन , इन्द्रिय जनित संचालनीय उपयोगीय , उपभोगीय क्रियाओं प्रक्रियाओं में बेईमानी से अनाचार से कमायी गयी धन सम्पत्ति उसका वैभव ऐश्वर्य सब उपरोक्त सत्य आचारीय , सत् ईश्वर आराधक को कभी भी अपने जीवन कार्य प्रणाली में उपयोग और उपभोग में नहीं लाना चाहिए तथा ना ही इस्तेमाल करना चाहिए । क्योंकि परमेश्वर निर्विकार, निश्च्छलीय है , निष्कपट है , निर्लिप्त है , निष्कामीय है , लोभ मोह से रहित है व अहंकार से मुक्त है। इस आचार को धारण करने पर ही जगदपिता , जगद्‌माता , जगद्ईश्वर के निमित्तीय तात्पर्यीय मंदिर, मस्जिद् ,चर्च , गुरुद्वारे जाने की सार्थकता है । महाभारत का प्रमाण है जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था भरी सभा में भीष्म प्रतिज्ञा जिनकी महान है वे भीष्म पितामह उस सभा में बैठे थे उनका मुंह बंद था । वे धृतराष्ट्र से भी बड़े थे चाहते तो द्रौपदी का चीरहरण रुक सकता था । परन्तु कारण वही था जैसा अन्न वैसा मन । वे गलत नीति अनीति धारी कौरवों का अन्न भोजन , राजसुख खा रहे थे , भोग रहे थे । इस कारण सत्य उनके मुंह से एक शब्द एक डांट का नहीं निकला । जबकि वे सबसे ज्यादा सबल सशक्त बलवान थे । ऐसे ही कुछ शब्द मोमिन सद्ग्रन्थों से आया है कि हराम की कमाई अर्थात् गलत अनैतिक कमाई का एक लुकमा ( एक रोटी का कौर या अन्य कोई खाद्य पदार्थ का एक कौर )चालीस दिन की नमाजीय इबादत को बरबाद कर देता है। तो अनैतिक भ्रष्ट आचारीय कोई भी काम परमेश्वर परम सत्ता सर्वोच्च सत्ता जगद्ईश्वर से प्रेम स्नेह उसकी सत्य पाठ पूजा इबादत में पूर्णतया बाधक है अथवा परमेश्वर से मिलने में बाधक है । मेरे सत्य को मानो तो ठीक है ना मानो तो ठीक है मुझ मूर्ख को अन्तःकरणीय जो निर्देश है / संदेश है ।मैं वह राग अलाप रहा हूँ । मेरी कोई बनावटी , अपने से जोड़ी हुई कोई भूल हो तो हे मेरे ईश्वर अंशीय आत्मीयजन , आत्मीय बंधु , माताओं , बहिनों , बेटियों मुझे छमा कर देना ।

आपका अपना आत्मिक – डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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