व्यक्ति का जन्म लेने या जीवन जीने का सत्य अभिप्राय है अथवा सत्य तात्पर्य है अच्छे और सत्य कर्म करना चाहिए और ज्यादातर सम्पूर्णतया शान्त रहना चाहिए। अब प्रश्न आता है अच्छे और सच्चे कर्म हैं, क्या ? अच्छे और सच्चे कर्म हैं, सत्य गुणीय, सात्विकीय प्रकृतीय दिनचर्या। रात्रिको जल्दी सोना और सूर्योदय से पहिले उठना। शौचादि क्रिया, दंतधावन, स्नान आदि से निवृत होकर थोड़ा सा समयानुकूल व्यायायाम, कसरत अथवा प्रातः भ्रमण जो व्यक्ति के लिए स्वास्थ प्रद होता रहता व सेहत के लिए सत्य आवश्यक है। फिर सुपाच्य अल्पाहार लें। व सत्यश्रमशील मेहनतकश होते रहते हुए अपने जीवन लक्ष्य विद्या अर्जन या कार्य व्यापार करने या शासकीय सेवा में होने पर अपना सम्पूर्ण ध्यान पूर्ण एकाग्रता से कार्य के प्रतिपूर्ण समर्पित होकर अपना सम्पूर्ण फोकस ध्यान ज्ञान का , अनुभव अनुभूति का उसी अपने जीवन , कार्य लक्ष्य पर करना व रखना । दोपहर पूर्ण आहार सुपाच्य भोजन लें । आवश्यकता समझें समय हो तो थोड़ा विश्राम भी किया जा सकता है। रात्रि को हल्का भोजन व सोते समय अगर व्यवस्था हो तो गुनगुना दुग्ध भी लिया जा सकता है अथवा ले सकते हो । यह तो जीवनचर्या कार्यचर्या नित्य प्रति की हो गई। अब मनोभाव और  “ अति आवश्यक आचार कर्म, सत्य मनोभावीय, चारित्रिक कर्म ”  पूर्ण सत्य ईमानदारी पूर्ण मनोभाव होना व रखना । किसी भी जीव, प्राणी , मानव, पशुपक्षी को पीड़ा देने से बचना, कोई भी हिंसा करने से बचना । । कहीं किसी के साथ धोखा व दगा, विश्वासघात , छल फरेब, झूठ पाखण्ड , अन्याय अत्याचार इन सब से अपनाने , करने से सदैव बचना तथा जहाँ जो जिसके प्रति घर, परिवार ,निजजन, समाज , संसार जनों के प्रति जो कर्तव्य दायित्व अपनी आत्मा के मापदण्ड से होता हो,रहता हो, बनता हो उसे पूर्ण परमसत्य ईमानदारी से निर्वहन करना। बस यही व्यक्ति के लिए मानव (नर-नारी , स्त्री  पुरुष ) के जन्म लेने व सत्य जीवन जीने का सत्य आभिप्राय है अथवा सत्यतात्पर्य है।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री “

Share.